सनातन शास्त्रों में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देव कहा गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण और पूजन के बिना अधूरी मानी जाती है। मान्यता है कि जो भक्त नियमित रूप से भगवान गणेश की पूजा-आराधना करता है, उसके जीवन से विघ्न, बाधाएं और नकारात्मकता दूर हो जाती हैं। बप्पा की कृपा से बुद्धि, विवेक, वाणी और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शास्त्रों के अनुसार, गणेश पूजन के बाद धूप-दीप से आरती करना अत्यंत शुभ माना गया है। आरती केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव का माध्यम है। विशेष रूप से “सुखकर्ता दुखहर्ता” गणेश जी की आरती का नियमित पाठ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और कार्यों में सफलता प्रदान करता है।
गणेशोत्सव के समय विधि-विधान से की गई पूजा-आरती का विशेष महत्व है, लेकिन यदि कोई भक्त प्रतिदिन श्रद्धा और विश्वास के साथ गणपति बप्पा की आरती करता है, तो उसके सभी कार्य निर्विघ्न पूर्ण होते हैं। यह आरती भगवान गणेश के सौंदर्य, करुणा और महिमा का वर्णन करती है, जिससे मन शांत होता है और आत्मबल बढ़ता है।
जो भक्त सच्चे मन से बप्पा के चरणों में आरती अर्पित करता है, उसके जीवन में सुख, शांति, संतति, संपत्ति और सफलता का वास होता है। भगवान गणेश अपने भक्तों के संकट हरकर उन्हें मंगल और कल्याण का मार्ग दिखाते हैं।
गणेश जी की आरती सुखकर्ता दुखहर्ता
सुख करता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाची
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची
सर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राची
कंठी झलके माल मुकताफळांची
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति
जय देव जय देव
रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा
रुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति
जय देव जय देव
लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना
सरल सोंड वक्रतुंडा त्रिनयना
दास रामाचा वाट पाहे सदना
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति
जय देव जय देव
शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुख को
दोन्दिल लाल बिराजे सूत गौरिहर को
हाथ लिए गुड लड्डू साई सुरवर को
महिमा कहे ना जाय लागत हूँ पद को
जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव
अष्ट सिधि दासी संकट को बैरी
विघन विनाशन मंगल मूरत अधिकारी
कोटि सूरज प्रकाश ऐसे छबी तेरी
गंडस्थल मद्मस्तक झूल शशि बहरी
जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव
भावभगत से कोई शरणागत आवे
संतति संपत्ति सबही भरपूर पावे
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे
गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव