भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में भगवान गणेश का स्थान सर्वोच्च माना गया है। उन्हें विघ्नहर्ता, बुद्धि, विवेक और समृद्धि का अधिष्ठाता देव कहा गया है। किसी भी शुभ कार्य, धार्मिक अनुष्ठान या उत्सव की शुरुआत गणेशजी की पूजा-अर्चना से होती है। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
गणेश जी का स्वरूप और परिवार
भगवान गणेश का स्वरूप गजमुख और बालक के धड़ का है। उनका वाहन मूषक है और प्रिय भोग मोदक माना जाता है। वे माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र हैं। उनके भाई कार्तिकेय और बहन अशोकसुंदरी हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उनकी दो पत्नियां- रिद्धि और सिद्धि हैं। इन्हीं से उन्हें शुभ और सफलता का वरदान प्राप्त है। यही कारण है कि उन्हें सफलता का प्रतीक भी कहा जाता है।
गणेश जी के बारह प्रमुख नाम
धार्मिक ग्रंथों में गणेश जी के अनेक नामों का उल्लेख मिलता है। किंतु विशेष रूप से बारह नाम अत्यंत पूजनीय माने जाते हैं—
- समुख
- एकदंत
- कपिल
- गजकर्णक
- लंबोदर
- विकट
- विघ्ननाशक
- विनायक
- धूम्रकेतु
- गणाध्यक्ष
- भालचंद्र
- गजानन
विद्यारंभ, विवाह और शुभ कार्यों में इन नामों का स्मरण करना अत्यंत फलदायी बताया गया है।
गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा
गणेश चतुर्थी से जुड़ी कथा अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने स्नान करते समय अपने उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसे घर के द्वार पर पहरेदारी का आदेश दिया। यही बालक गणेश कहलाए।
इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश ने उन्हें रोक दिया और कहा कि जब तक माता पार्वती स्नान करके न निकलें, तब तक कोई भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। शिवजी ने समझाया कि वे स्वयं गणेश के पिता हैं, किंतु गणेश अपनी माता के आदेश पर अडिग रहे। इससे क्रोधित होकर शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया।
गजमुख गणेश का पुनर्जन्म
जब माता पार्वती ने यह दृश्य देखा तो वे रौद्र रूप में प्रकट हुईं और अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की जिद पर अडिग रहीं। तब भगवान शिव ने विष्णु जी को आदेश दिया कि किसी ऐसे शिशु का सिर लाया जाए, जिसकी मां अपने बच्चे की ओर पीठ किए सो रही हो।
गरुड़ की खोज में केवल एक हथिनी ऐसी मिली। उसका शिशु ही इस शर्त पर खरा उतरा। उसका सिर लाकर शिवजी ने गणेश के धड़ पर स्थापित किया और उन्हें नया जीवन प्रदान किया।
प्रथम पूज्य का वरदान
इस घटना के बाद भगवान शिव ने गणेश को यह वरदान दिया कि संसार में किसी भी शुभ कार्य या पूजा का आरंभ उनके नाम से होगा। तभी से गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है।
गणेश चतुर्थी का पर्व इसी कथा की स्मृति और श्रद्धा का प्रतीक है। देश के विभिन्न राज्यों में, विशेषकर महाराष्ट्र में, गणेश उत्सव 10 दिनों तक मनाया जाता है। इसमें घर-घर और पंडालों में गणपति बप्पा की स्थापना, पूजा, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
आधुनिक समय में गणेश चतुर्थी का महत्व
आज गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक पर्व ही नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। लोग एकत्र होकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं, भक्ति गीत गाते हैं और शोभायात्राएं निकालते हैं। इस अवसर पर पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मिट्टी की प्रतिमाओं का प्रयोग भी प्रोत्साहित किया जाता है।
गणपति बप्पा की भक्ति केवल आस्था नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के जीवन में अनुशासन, संयम, बुद्धि और धैर्य का संदेश भी देती है।