गणेश चतुर्थी का पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन उत्सव पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन श्रद्धालु गणपति बप्पा को अपने घर या पंडालों में स्थापित करते हैं और विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। गणेश जी को मोदक, दूर्वा, लाल फूल और सिंदूर चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पूजा के अंत में भगवान गणेश की आरती करने से पूजा पूर्ण मानी जाती है। आरती के दौरान वातावरण में “जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, मात-पिता तुम्हारे पार्वती-देवा” की मधुर ध्वनि गूंजती है, जो पूरे माहौल को भक्तिमय बना देती है।
माना जाता है कि जो भक्त श्रद्धा से यह आरती गाते हैं, उनके जीवन से सभी विघ्न और बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख, समृद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है। गणेश उत्सव के दौरान प्रतिदिन सुबह और शाम आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा और आनंद का वास होता है।
गणेश जी के मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं।
विघ्नशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥
ॐ ग्लौम गौरी पुत्र,वक्रतुंड,गणपति गुरु गणेश
ग्लौम गणपति,ऋदि्ध पति। मेरे दूर करो क्लेश।।
एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं।
विघ्नशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्
श्री गणेश आरती
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची
कंठी झलके माल मुक्ता फलांची।
जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव
जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति
दर्शन मात्रे मन कामना पूर्ती। जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा
हीरे जड़ित मुकुट शोभतो बरा
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया।
जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव
जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति
दर्शन मात्रे मन कामना पूर्ती। जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव
लम्बोदर पीताम्बर फणिवर बंधना
सरल सोंड वक्र तुंड त्रिनयना
दास रामाचा वाट पाहे सदना
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुर वर वंदना।
जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव
जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति
दर्शन मात्रे मन कामना पूर्ती। जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव ।।