“दिव्यसुधा – भक्ति की अमृत धारा” के प्रति आपके निरंतर स्नेह और विश्वास के लिए हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।
मार्च का यह अंक केवल पर्वों और कथाओं का संकलन नहीं, बल्कि सनातन चेतना की उस जीवंत यात्रा का विस्तार है, जहां भक्ति, वैराग्य, करुणा और आत्मबोध एक साथ प्रवाहित होते हैं। यह महीना फाल्गुन की विदाई और चैत्र के नव आरम्भ का साक्षी है, जहां जीवन स्वयं उत्सव और साधना का संगम बन जाता है।
इस अंक में ब्रज की होली, जहां रंग नहीं बल्कि भक्ति बरसती है यह हमें प्रेम और समर्पण का अर्थ सिखाती है, तो काशी की मसान होली जीवन और मृत्यु के समभाव का गहन संदेश देती है। होलिका दहन में ढूंढी राक्षसी की कथा अहंकार के दहन और सत्य की विजय का प्रतीक बनकर सामने आती है। शीतला अष्टमी हमें स्वास्थ्य, शुद्धता और मातृ करुणा की अनुभूति कराती है, वहीं चैत्र नवरात्रि शक्ति, भक्ति और नए संकल्पों का पावन द्वार खोलती है।
श्रीराम के मित्र निषादराज गुह की निष्काम भक्ति, सनातन धर्म में भक्ति के महत्व का गहन विवेचन और दरिद्र विधवा ब्राह्मणी के भोले पुत्र की कथा यह स्पष्ट करती है कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग पद, धन या विद्या से नहीं, बल्कि निर्मल हृदय से बनता है। मंथरा का प्रसंग हमें यह समझाता है कि जीवन की हर घटना के पीछे एक दैवी योजना होती है, जो अंततः धर्म की स्थापना करती है।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का गौरवपूर्ण इतिहास और बाराही देवी शक्तिपीठ के दिव्य चमत्कार हमारी आस्था की अटूट परंपरा को पुनः स्मरण कराते हैं। दिव्यसुधा का यह मार्च अंक पाठकों को यही स्मरण कराता है कि धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, अर्थपूर्ण और करुणामय बनाने की शाश्वत पद्धति है। आइए, इस आध्यात्मिक यात्रा में सहभागी बनें और सनातन मूल्यों को अपने जीवन में उतारें।
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