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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > देवार्क सूर्य मंदिर: वैदिक ‘अर्क’ स्वरूप और प्राचीन पौराणिक इतिहास
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देवार्क सूर्य मंदिर: वैदिक ‘अर्क’ स्वरूप और प्राचीन पौराणिक इतिहास

दिव्यसुधा
Last updated: November 27, 2025 6:04 pm
दिव्यसुधा
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देवार्क सूर्य मंदिर, बिहार – वैदिक ‘अर्क’ स्वरूप वाले सूर्य देव का पश्चिमाभिमुख प्राचीन मंदिर
बिहार का देवार्क सूर्य मंदिर – जहां सूर्य देव ‘अर्क’ स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं और अदिति की तपस्या की धरा आज भी पावन ऊर्जा से स्पंदित होती है।
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बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देवार्क सूर्य मंदिर न सिर्फ एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, बल्कि यह सूर्य देव की उपासना से जुड़ी भारत की वैदिक परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है। यह मंदिर भगवान सूर्य को उनके वैदिक नाम “अर्क” के रूप में समर्पित है। इसकी विशेषता यह है कि यह मंदिर पश्चिमाभिमुख है, जबकि भारत के अधिकांश सूर्य मंदिर पूर्वाभिमुख होते हैं। यह अद्भुत स्थापत्य कला और आस्था का संगम, आज भी सूर्य उपासना की प्राचीन धारा को सजीव रखे हुए है।


वैदिक ग्रंथों में सूर्य देव का ‘अर्क’ स्वरूप

वेदों में सूर्य देव को ‘अर्क’ नाम से संबोधित किया गया है। सूर्य नमस्कार के तेरह मंत्रों में से एक मंत्र “ओम अर्काय नमः” में भी सूर्य के इस स्वरूप की आराधना की जाती है। ‘अर्क’ का अर्थ ‘ऊर्जा’ और ‘रस’ दोनों से जुड़ा है। वैदिक मान्यता के अनुसार सूर्य वही शक्ति हैं जो समस्त जीवों में ऊर्जा और जीवन का संचार करती है। देवार्क सूर्य मंदिर इसी वैदिक भावना का केंद्र है, जहां आज भी सूर्य उपासना के प्राचीन मंत्रों की गूंज सुनाई देती है।


तीन सूर्य मंदिरों की पौराणिक कड़ी

देवार्क सूर्य मंदिर के साथ एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब शिव के गण माली और सुमाली ने कठोर तपस्या की, तब देवराज इंद्र को भय हुआ। इंद्र के आदेश पर सूर्य देव ने अपना ताप बढ़ा दिया, जिससे माली-सुमाली का तप भंग हो सके। लेकिन इससे भगवान शिव रुष्ट हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से सूर्य को भेद दिया। सूर्य के तीन टुकड़े पृथ्वी पर गिरे पहला टुकड़ा देवार्क (बिहार), दूसरा लोलार्क (काशी, उत्तर प्रदेश) और तीसरा कोणार्क (ओडिशा) में। इसी कारण देवार्क सूर्य मंदिर को इन तीन पवित्र सूर्य मंदिरों की श्रृंखला का प्रथम भाग माना जाता है।


देव माता अदिति की तपस्या और सूर्य अवतार

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्रथम देवासुर संग्राम में जब देवताओं को हार का सामना करना पड़ा, तब देव माता अदिति ने देवारण्य (वर्तमान देवार्क) में कठोर तप किया। उन्होंने तेजस्वी और शक्तिशाली पुत्र की प्राप्ति के लिए देवी षष्ठी (छठी मैया) की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें वरदान दिया कि उनके गर्भ से एक दिव्य पुत्र उत्पन्न होगा जो देवताओं को विजय दिलाएगा। अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए आदित्य भगवान — जो सूर्य देव के रूप में प्रकट हुए — ने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। इसीलिए देवार्क स्थान को सूर्य अवतार का जन्मस्थल भी कहा जाता है।


अद्वितीय वास्तु और स्थापत्य कला

देवार्क सूर्य मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका पश्चिमाभिमुख होना है। जहां अधिकतर सूर्य मंदिरों का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है ताकि सूर्य की प्रथम किरणें देवता पर पड़ें, वहीं देवार्क मंदिर में सूर्य अस्त की दिशा की ओर मुख किए हुए हैं। इस विशिष्ट स्थापत्य से यह संदेश मिलता है कि सूर्य की ऊर्जा केवल उगते समय ही नहीं, बल्कि अस्त होते समय भी जीवनदायिनी होती है।

पत्थरों से तराशे गए इस मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर अत्यंत सुंदर नक्काशी की गई है। इसकी शिल्पकला छठी से आठवीं शताब्दी के मध्यकाल की मानी जाती है। इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर गुप्तकाल या उससे पूर्व की कलात्मक परंपरा से जुड़ा हुआ है। वहीं पौराणिक मतों के अनुसार, यह मंदिर त्रेता या द्वापर युग में निर्मित हुआ था।


देवार्क की आध्यात्मिक शक्ति और ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष शास्त्र में षष्ठ भाव शत्रु पर विजय और सुरक्षा का द्योतक है, जबकि पंचम भाव संतान सुख का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब अदिति ने तप किया था, तब प्रकृति के छठे अंश से देवी प्रकट हुई थीं। यही कारण है कि इस स्थान को संतान सुख और जीवन की रक्षा से जुड़ी दिव्य ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। देवार्क सूर्य मंदिर आज भी बिहार की आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु सूर्य की अनंत ज्योति से अपने जीवन में नई ऊर्जा का अनुभव करता है।

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