कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला दीपावली का पर्व भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल दीप जलाने या मिठाइयां बाँटने का नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। माना जाता है कि जैसे साधक ध्यान के माध्यम से अपने मन के अंधकार को मिटाता है, वैसे ही दीपावली में दीपक जलाकर व्यक्ति अपने जीवन से अज्ञान और नकारात्मकता को दूर करता है। सनातन धर्म के अनुसार, दीपक को भगवान विष्णु का प्रतीक माना गया है, इसलिए दीपावली आत्मा के जागरण और ईश्वरीय प्रकाश का उत्सव है। इस दिन घरों में दीप जलाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और घर में माता लक्ष्मी का आगमन माना जाता है।
सतयुग में दीपावली की शुरुआत
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इस मंथन से कई दिव्य रत्नों के साथ भगवान धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। यह तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी थी, जिसे आज धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। समुद्र मंथन के दौरान ही माता लक्ष्मी का भी प्राकट्य हुआ, जो कमल के फूल पर विराजमान थीं। माता लक्ष्मी की कृपा से ही समृद्धि और वैभव प्राप्त होता है, इसलिए देवताओं ने उनके प्रकट होने की खुशी में दीप जलाए। उसी क्षण से दीपावली मनाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है।
त्रेतायुग की दीपावली कथा
त्रेतायुग में दीपावली का महत्व भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़ा है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस के अनुसार, जब भगवान राम 14 वर्षों का वनवास पूर्ण कर माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरे अयोध्या नगरी को दीपों से सजाया गया। हर घर, हर गली, हर मार्ग प्रकाश से जगमगा उठा। यह दिन कार्तिक अमावस्या का था। भगवान राम के लौटने से अंधकार मिटा और धर्म की पुनर्स्थापना हुई। इसी खुशी में दीपावली का त्योहार मनाया गया और तब से यह दिन अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक बन गया।
द्वापरयुग की दीपावली कथा
द्वापरयुग में भी दीपावली से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि इस युग में नरकासुर नामक एक दानव था जिसने देवताओं और मनुष्यों पर अत्याचार बढ़ा दिए थे। उसने कई कन्याओं को बंदी बना रखा था। जब उसके अत्याचार असहनीय हो गए, तब भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा, जो पृथ्वी देवी का अवतार थीं, ने राक्षस नरकासुर का संहार किया। यह दिन कार्तिक मास की चतुर्दशी का था। नरकासुर के वध की खुशी में लोगों ने अपने घरों में दीपक जलाए और उल्लास मनाया। तभी से इस दिन को नरक चतुर्दशी और अगले दिन कार्तिक अमावस्या को दीपावली के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।
दीपावली का आध्यात्मिक महत्व
दीपावली केवल बाहरी प्रकाश का त्योहार नहीं है, बल्कि यह आंतरिक ज्योति को प्रज्वलित करने का संदेश भी देती है। हर दीपक यह प्रतीक है कि हमें अपने भीतर की अच्छाई को जगाना चाहिए और अंधकार यानी नकारात्मक विचारों को मिटाना चाहिए। दीपक का प्रकाश यह दर्शाता है कि भले ही अंधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी सी लौ भी पूरे वातावरण को रोशन कर सकती है। यह पर्व आत्मचिंतन और कृतज्ञता का समय है अपने जीवन में ईश्वर के आशीर्वाद को पहचानने और दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाने का अवसर है।
दीपावली का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
दीपावली केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व एकता, भाईचारा और प्रेम का प्रतीक बन गया है। लोग एक-दूसरे को मिठाइयां देते हैं, रिश्तों में नई गर्माहट लाते हैं और समाज में सौहार्द का संदेश देते हैं। इस दिन व्यापारी नया लेखा-जोखा शुरू करते हैं और इसे अपने व्यवसाय की नई शुरुआत मानते हैं। देश के हर राज्य में दीपावली की अपनी विशेष परंपराएँ हैं कहीं इसे काली पूजा के रूप में मनाया जाता है, तो कहीं गोवर्धन पूजा के रूप में।
युगों से चला आ रहा प्रकाश का उत्सव
चारों युगों में दीपावली अलग-अलग रूपों में मनाई गई, लेकिन इसका मूल संदेश सदैव एक ही रहा अंधकार पर प्रकाश की विजय। यह त्योहार हमें सिखाता है कि चाहे समय कितना भी बदल जाए, सच्चाई, धर्म और प्रकाश की शक्ति कभी कम नहीं होती। यही कारण है कि दीपावली आज भी पूरे भारत और विश्व में सबसे प्रिय और उत्साहपूर्ण पर्व के रूप में मनाई जाती है। यह त्योहार हर हृदय में आशा, प्रेम और आत्मिक प्रकाश का दीप प्रज्वलित करता है।