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दिव्य सुधा > अन्य > आरती की दक्षिणावर्त दिशा: आध्यात्मिक विज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का रहस्य
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आरती की दक्षिणावर्त दिशा: आध्यात्मिक विज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का रहस्य

दिव्यसुधा
Last updated: December 11, 2025 11:46 am
दिव्यसुधा
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आरती की दक्षिणावर्त दिशा का महत्व, आध्यात्मिक ऊर्जा और ब्रह्मांडीय लय
दक्षिणावर्त दिशा में आरती—ब्रह्मांडीय ऊर्जा और ईश-शक्ति का दिव्य संगम
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आरती हिंदू पूजा-पद्धति का वह दिव्य क्षण है जहां भक्त और भगवान के बीच का हर विभाजन मिट जाता है और आत्मा सीधे परम चेतना से जुड़ जाती है। यह केवल दीपक घुमाने की एक परंपरागत क्रिया नहीं, बल्कि इसके भीतर ऊर्जा के प्रवाह, श्रद्धा की शक्ति, ब्रह्मांड के नियम और सनातन ज्ञान का गहरा संगम छिपा है। लाखों लोग रोजाना आरती करते हैं, लेकिन कई बार यह समझ नहीं पाते कि आरती किस दिशा में और क्यों की जानी चाहिए। शास्त्र और आध्यात्मिक विज्ञान दोनों ही स्पष्ट रूप से बताते हैं कि आरती सदैव दक्षिणावर्त यानी दक्षिणावर्त दिशा में ही घुमाई जानी चाहिए, क्योंकि यही दिशा सृष्टि की मूल गति, ऊर्जा का प्राकृतिक प्रवाह और जीवन की दिव्य लय को व्यक्त करती है।

दक्षिणावर्त दिशा का ब्रह्मांडीय रहस्य
ब्रह्मांड की पूरी संरचना और ऊर्जा की गतिशीलता दक्षिणावर्त दिशा का अनुसरण करती है, और यही कारण है कि इसे सृष्टि की प्राकृतिक लय कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर दक्षिणावर्त घूमती है, ग्रह-नक्षत्र अपनी कक्षाओं में इसी दिशा में परिक्रमा करते हैं, यहां तक कि पानी का भँवर भी दक्षिणावर्त घूमकर ऊर्जा का केंद्र बनाता है। जब आरती की थाली को इसी दिशा में घुमाया जाता है, तो भक्त स्वयं को ब्रह्मांड की मूल गति के अनुरूप कर लेता है। यह जुड़ाव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऊर्जा-स्तर पर भी अत्यंत प्रभावी होता है, क्योंकि दक्षिणावर्त गति से उत्पन्न ऊर्जा-वृत वातावरण में एक दिव्य स्पंदन पैदा करता है, जो पूजा स्थल को शक्ति, प्रकाश और पवित्रता से भर देता है।

आरती की सही दिशा का आध्यात्मिक विज्ञान
दक्षिणावर्त दिशा में किए गए आरती-चक्र के पीछे गहरा आध्यात्मिक विज्ञान है, जो सकारात्मक ऊर्जा को सक्रिय कर नकारात्मकता को स्वतः दूर कर देता है। दीपक की अग्नि, कपूर की सुगंध, घंटे की ध्वनि और आरती की गति मिलकर एक शक्तिशाली ऊर्जा-भंवर बनाते हैं, जो मन की जड़ता, आलस्य और तमस को नष्ट कर चेतना को प्रकाशित करता है। यह प्रक्रिया केवल पूजा का भाग नहीं, बल्कि एक ऊर्जा-स्नान है जिसमें भक्त की आत्मा ईश-शक्ति से ओत-प्रोत हो जाती है। अग्नि तत्व का तेज दक्षिणावर्त गति के साथ भक्त तक पहुँचकर उसकी सूक्ष्म शक्तियों को जाग्रत करता है, जिससे आरती एक साधारण क्रिया न होकर एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है।

धार्मिक दृष्टि: परिक्रमा का सूक्ष्म रूप
हिंदू धर्म में देवता की परिक्रमा सदैव दक्षिणावर्त दिशा में की जाती है, क्योंकि यह ईश-ऊर्जा के सम्मान और समर्पण का प्रतीक है। आरती इसी परिक्रमा का सूक्ष्म, शक्तिशाली और दिव्य रूप है। जब भक्त देवता को केंद्र मानकर प्रकाश, ध्वनि और श्रद्धा के साथ दक्षिणावर्त गति में आरती करता है, तो यह संकेत देता है कि उसका जीवन, उसकी चेतना और उसके सभी कर्म ईश्वर के ही इर्द-गिर्द घूमते हैं। यह क्रिया सृष्टि-स्थिति-संहार के त्रिदेविक चक्र का प्रतिनिधित्व मानी जाती है, जहां आग की लौ सृष्टि, कपूर की सुगंध स्थिति और ध्वनि संहार के माध्यम से नकारात्मकता को दूर करती है।

दक्षिणावर्त के आध्यात्मिक लाभ
दक्षिणावर्त दिशा में की गई आरती मन में गहरी शांति, स्थिरता और आध्यात्मिक जागरण उत्पन्न करती है, जो घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा, दिव्य संरक्षण और मानसिक संतुलन का वातावरण बनाती है। यह दिशा नकारात्मक शक्तियों को कमजोर कर सकारात्मक स्पंदनों को आकर्षित करती है, जिससे पूजा का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि आरती केवल पूजा का अंतिम चरण नहीं, बल्कि सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक क्षण है जहां भक्त की ऊर्जा, देवता की कृपा और ब्रह्मांड की प्राकृतिक लय एकाकार होकर एक दिव्य अनुभव उत्पन्न करती है।

TAGGED:Aarti DirectionBhakti & UpasanaDivine PracticesHindu RitualsPositive EnergySanatan DharmaSpiritualSpiritual ScienceWorship Methods
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