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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > बसौड़ा पर्व 2026: काशीपुर के श्री शीतला माता मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
मंदिर

बसौड़ा पर्व 2026: काशीपुर के श्री शीतला माता मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

Ekta Mishra
Last updated: March 10, 2026 12:26 pm
Ekta Mishra
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बसौड़ा पर्व के अवसर पर काशीपुर के श्री शीतला माता मंदिर में माता शीतला के दर्शन करते श्रद्धालु
बसौड़ा पर्व पर काशीपुर के श्री शीतला माता मंदिर में माता के दर्शन के लिए उमड़ी भक्तों की भीड़।
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शीतला अष्टमी, जिसे बसौड़ा पर्व के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में आस्था और श्रद्धा का एक महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस वर्ष शीतला अष्टमी का पावन पर्व 11 मार्च को मनाया जा रहा है। इस दिन माता शीतला की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उन्हें बसौड़ा यानी एक दिन पहले बनाए गए बासी भोजन का भोग अर्पित किया जाता है। इसी अवसर पर उत्तराखंड के काशीपुर स्थित ऐतिहासिक सिद्ध पीठ श्री शीतला माता मंदिर में इन दिनों भक्ति और आस्था की अद्भुत झलक देखने को मिल रही है। मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।

मंदिर में उमड़ रही है भक्तों की भीड़
बसौड़ा पर्व को लेकर काशीपुर के श्री शीतला माता मंदिर में चैत्र मास की द्वितीया तिथि से ही भक्तों की भीड़ लगनी शुरू हो गई है। श्रद्धालु माता के दर्शन कर परिवार के सुख, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना कर रहे हैं। सुबह के समय मंदिर का वातावरण विशेष रूप से भक्तिमय हो जाता है, जब सुबह 5 बजे से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगने लगती हैं। भक्त पूरी श्रद्धा के साथ माता को प्रसाद अर्पित करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं।

रोगों से मुक्ति का महापर्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता शीतला को ‘रोग हरण अवतारी’ देवी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि उनकी पूजा से रोगों और महामारी से रक्षा होती है। मंदिर के पंडित के अनुसार माता शीतला को महाकाली, नगरकोट देवी और मसानी माता जैसे कई पवित्र नामों से भी पूजा जाता है। विशेष रूप से ऋतु परिवर्तन के समय होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए माता शीतला की आराधना को अत्यंत फलदायी माना जाता है।

विशेष सामग्री से की जाती है पूजा
बसौड़ा पर्व पर भक्त माता को प्रसन्न करने के लिए पारंपरिक सामग्री अर्पित करते हैं। पूजा में हल्दी का तिलक लगाया जाता है, जो पवित्रता और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही कच्चा दूध, नारियल, चना दाल, मसूर, गुड़, आटा, पुए और सरसों का तेल भी माता को अर्पित किया जाता है। नमक और हल्दी को भी स्वच्छता और रोगों से मुक्ति के प्रतीक के रूप में चढ़ाया जाता है।

श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था
बसौड़ा पर्व के अवसर पर मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था की है। पंडित संदीप मिश्रा के अनुसार होली के बाद से बैसाखी तक हर सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को मंदिर में विशेष पूजा का आयोजन होता है। इस वर्ष 10 और 11 मार्च को मुख्य बसौड़ा पूजन होने के कारण मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है, जिसे देखते हुए प्रशासन ने दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए हैं।

बसौड़ा पर्व का संदेश
बसौड़ा का यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, स्वास्थ्य और प्रकृति के प्रति जागरूकता का भी संदेश देता है। मान्यता है कि जो भक्त सच्ची श्रद्धा से माता शीतला को बसौड़ा का भोग अर्पित करते हैं, उनके घर से रोग, कष्ट और दरिद्रता दूर होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यही कारण है कि हर वर्ष यह पर्व भक्तों के लिए विशेष आस्था और विश्वास का प्रतीक बनकर आता है।

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