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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > Badrinath Temple : बद्रीनाथ धाम के कपाट खुले, जानिए मंदिर का इतिहास, महत्व और रहस्य
मंदिर

Badrinath Temple : बद्रीनाथ धाम के कपाट खुले, जानिए मंदिर का इतिहास, महत्व और रहस्य

दिव्यसुधा
Last updated: May 5, 2025 3:02 pm
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badrinath temple
Badrinath Temple : बद्रीनाथ धाम के कपाट खुले, जानिए मंदिर का इतिहास, महत्व और रहस्य
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Badrinath Temple : उत्तराखंड में स्थित पवित्र बद्रीनाथ मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही चार धाम यात्रा 2025 का शुभारंभ हो चुका है। यह यात्रा केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और आत्मिक शांति का एक अद्वितीय अनुभव भी है। इससे पहले गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ के कपाट खोले जा चुके हैं। बद्रीनाथ मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के साथ पुष्पवर्षा की गई और हजारों श्रद्धालु इस दिव्य क्षण के साक्षी बने।

भगवान विष्णु का पवित्र निवास
बद्रीनाथ धाम को भगवान विष्णु का धाम माना जाता है। यह मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में 3,133 मीटर (10,279 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है और इसे चारधामों में सबसे प्रमुख स्थान प्राप्त है। मंदिर में विराजमान शालिग्राम पत्थर से बनी मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है। यह मूर्ति भगवान विष्णु के ‘बद्री नारायण’ स्वरूप को समर्पित है। यह मूर्ति किसी मानव द्वारा नहीं बनाई गई, बल्कि प्राकृतिक रूप से उत्पन्न मानी जाती है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

कपाट केवल 6 महीने के लिए ही क्यों खुलते हैं?
बद्रीनाथ धाम के कपाट हर साल केवल मई से नवंबर तक ही खुले रहते हैं। शेष छह महीने, अत्यधिक ठंड और बर्फबारी के कारण मंदिर बंद कर दिया जाता है।

एक चमत्कारी परंपरा
मंदिर बंद करते समय अंदर एक अखंड दीपक जलाया जाता है, जो बिना किसी देखरेख के पूरे छह महीने तक जलता रहता है। यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है कि बिना किसी ईंधन या देखरेख के यह दीपक कैसे जलता रहता है।

आदि शंकराचार्य की भूमिका
बद्रीनाथ धाम के वर्तमान स्वरूप के पीछे 8वीं शताब्दी के महान संत आदि शंकराचार्य का योगदान है। कहा जाता है कि उन्होंने नारद कुंड से भगवान विष्णु की मूर्ति को प्राप्त किया और मंदिर में पुनः स्थापना की। आदि शंकराचार्य ने ही बद्रीनाथ को वैष्णव धर्म का एक प्रमुख तीर्थस्थल बनाया और हिंदू धर्म के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मंदिर के रहस्यमयी जल स्रोत
तप्त कुंड

मंदिर के पास स्थित यह गर्म पानी का स्रोत है, जिसे आध्यात्मिक और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश से पहले यहां स्नान करते हैं। मान्यता है कि इससे सभी पापों का नाश होता है।

नारद कुंड
यह ठंडे पानी का स्रोत है, जहां नारद मुनि ने तपस्या की थी। यहीं से आदि शंकराचार्य को भगवान विष्णु की मूर्ति प्राप्त हुई थी। दोनों कुंड एक-दूसरे के पास स्थित हैं, लेकिन उनके जल का तापमान पूरी तरह भिन्न है — जो विज्ञान और आस्था दोनों के लिए आश्चर्यजनक है।

बद्रीनाथ से जुड़ी पौराणिक कथाएं
बद्रीनाथ धाम से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं, जो इसे हिंदू धर्म का आध्यात्मिक केंद्र बनाती हैं।

विष्णु जी की तपस्या: एक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहां कठोर तपस्या की थी और देवी लक्ष्मी ने ‘बद्री वृक्ष’ (बेर का पेड़) बनकर उन्हें छाया प्रदान की थी। तभी इस स्थान का नाम ‘बद्रीनाथ’ पड़ा।

पांडवों का स्वर्गारोहण: महाभारत में वर्णन है कि पांडवों ने स्वर्गारोहण की यात्रा यहीं से शुरू की थी। इसलिए यह स्थल मोक्ष प्राप्ति का द्वार भी माना जाता है।

TAGGED:badrinath templehumare bhgwanबद्रीनाथ धामसनातन धर्म
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