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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > Kurma Jayanti 2026: कूर्म जयंती का महत्व, कथा और पूजा विधि
व्रत और त्योहार

Kurma Jayanti 2026: कूर्म जयंती का महत्व, कथा और पूजा विधि

दिव्यसुधा
Last updated: May 1, 2026 11:50 am
दिव्यसुधा
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कूर्म जयंती 2026 भगवान विष्णु कच्छप अवतार पूजा विधि
कूर्म जयंती 2026: जानें कच्छप अवतार की कथा और पूजा का सही समय
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हिंदू धर्म में वैशाख मास की पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है, क्योंकि इसी पावन तिथि पर भगवान श्री विष्णु के कच्छप (कूर्म) अवतार से जुड़ी कूर्म जयंती मनाई जाती है। भगवान विष्णु को जगत का पालनहार कहा जाता है और उनके प्रत्येक अवतार का उद्देश्य सृष्टि के संतुलन को बनाए रखना है। कूर्म जयंती का पर्व इसी दिव्य संदेश को याद दिलाता है कि जब-जब धर्म पर संकट आता है, तब-तब भगवान स्वयं किसी न किसी रूप में प्रकट होकर उसकी रक्षा करते हैं। इस वर्ष कूर्म जयंती 01 मई 2026, शुक्रवार को मनाई जा रही है, जो भक्तों के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी मानी जा रही है।

कूर्म जयंती का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार वैशाख पूर्णिमा तिथि 30 अप्रैल 2026 को रात्रि 09:12 बजे से प्रारंभ होकर 01 मई 2026 को रात्रि 10:52 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार कूर्म जयंती का पर्व 01 मई को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की पूजा के लिए सायंकाल 04:17 से 06:56 बजे तक का समय अत्यंत शुभ माना गया है। इस समय विधि-विधान से की गई पूजा विशेष फल प्रदान करती है।

भगवान विष्णु को कब और क्यों लेना पड़ा कच्छप अवतार?
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई थी, जिसके परिणामस्वरूप असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा। चिंतित होकर सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे, और उनके मार्गदर्शन पर भगवान विष्णु से सहायता मांगी। तब श्री हरि ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया, जिससे अमृत प्राप्त किया जा सके।


जब समुद्र मंथन आरंभ हुआ, तब मंदराचल पर्वत को मथनी और शेषनाग को रस्सी बनाया गया। लेकिन मंदराचल पर्वत अत्यधिक भारी होने के कारण समुद्र में डूबने लगा, जिससे मंथन रुकने की स्थिति उत्पन्न हो गई। तब भगवान विष्णु ने कच्छप (कूर्म) अवतार धारण किया और विशाल कछुए का रूप लेकर समुद्र के नीचे अपनी पीठ पर पर्वत को स्थिर किया। उनकी इस लीला के कारण समुद्र मंथन सफल हुआ और उसमें से अमृत सहित चौदह रत्न प्रकट हुए, जिससे देवताओं को पुनः शक्ति प्राप्त हुई और सृष्टि का संतुलन स्थापित हुआ।

कूर्म जयंती की पूजा विधि
कूर्म जयंती के दिन प्रातःकाल स्नान और ध्यान करने के बाद घर के ईशान कोण या पूजा स्थल पर एक चौकी स्थापित करें। उस पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु के कच्छप अवतार की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। स्वयं भी संभव हो तो पीले वस्त्र धारण करें और पूजा के लिए पीले आसन का प्रयोग करें। सबसे पहले भगवान पर शुद्ध जल छिड़कें और फिर पीले चंदन, हल्दी या केसर से तिलक करें। इसके बाद पीले फूल, पीले फल, पीले वस्त्र और मिठाई अर्पित करें। पूजा के दौरान श्रद्धा और भक्ति भाव से कूर्म अवतार की कथा का पाठ या श्रवण करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और उनसे पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा याचना करें। यह पूजा सच्चे मन और श्रद्धा से की जाए तो विशेष पुण्यफल प्रदान करती है।

कूर्म जयंती का धार्मिक महत्व
हिंदू मान्यता के अनुसार कूर्म जयंती के दिन विधि-विधान से पूजा, व्रत और जप करने से भगवान विष्णु अपने भक्तों की सभी बाधाओं को दूर करते हैं। इस दिन की गई उपासना से जीवन की परेशानियां कम होती हैं, मानसिक शांति मिलती है और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। कूर्म अवतार हमें यह भी सिखाता है कि धैर्य, स्थिरता और समर्पण से ही जीवन की कठिनाइयों को पार किया जा सकता है। कुल मिलाकर कूर्म जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है जो हमें यह संदेश देती है कि जब जीवन में संकट आए, तो विश्वास और धैर्य के साथ आगे बढ़ें, क्योंकि भगवान हमेशा अपने भक्तों के साथ होते हैं।

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