हिंदू धर्म में शीतला माता को आरोग्य, स्वच्छता और रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। हर वर्ष शीतला अष्टमी और शीतला सप्तमी का व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है। कई स्थानों पर श्रद्धालु होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार या शुक्रवार को भी यह व्रत रखते हैं। इस दिन श्रद्धापूर्वक माता शीतला की पूजा-अर्चना करके भक्त अपने परिवार के स्वास्थ्य, सुख-शांति, संतान के उज्ज्वल भविष्य और रोगों से रक्षा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
बसोड़ा की परंपरा और बासी भोजन का महत्व
शीतला अष्टमी को कई स्थानों पर ‘बसोड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व की एक विशेष परंपरा है कि अष्टमी के दिन ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। इसके बजाय सप्तमी तिथि को ही माता के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है। इस प्रसाद में गन्ने के रस और चावल से बनी खीर, राबड़ी, पुआ, दही और अन्य ठंडे पकवान बनाए जाते हैं। अष्टमी के दिन इन्हीं ठंडे और एक दिन पहले बने व्यंजनों का माता को भोग लगाया जाता है और बाद में इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
मान्यता है कि माता शीतला को बासी भोजन का भोग अर्पित करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है और त्वचा संबंधी रोगों से भी राहत मिलती है। यह परंपरा स्वच्छता और स्वास्थ्य के महत्व को भी दर्शाती है, क्योंकि प्राचीन समय में माता शीतला को विशेष रूप से चेचक और अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता था।
शीतला अष्टमी का पूजा मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष शीतला अष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 06:36 बजे से सायं 06:27 बजे तक माना गया है। इस समय भक्त स्नान करके माता शीतला की विधिवत पूजा करते हैं, उन्हें ठंडे प्रसाद का भोग अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करते हैं।
शीतला माता की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक गांव में एक वृद्धा अपनी दो बहुओं के साथ रहती थी। एक दिन तीनों ने शीतला माता का व्रत रखने का निश्चय किया। इस व्रत की परंपरा के अनुसार बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और वही प्रसाद ग्रहण किया जाता है। लेकिन दोनों बहुओं ने हाल ही में संतान को जन्म दिया था, इसलिए उन्हें डर था कि बासी भोजन उनके लिए हानिकारक हो सकता है। इसी कारण उन्होंने सुबह ताजा भोजन बना लिया।
जब सास को इस बात का पता चला तो वह बहुत नाराज़ हुई। कुछ ही समय बाद दुखद समाचार मिला कि दोनों बहुओं की संतानों की अचानक मृत्यु हो गई। इस घटना से दुखी होकर सास ने दोनों बहुओं को घर से बाहर निकाल दिया। दोनों बहुएं अपने बच्चों के शव लेकर घर से निकल पड़ीं।
रास्ते में उन्हें दो बहनें मिलीं, जिनका नाम ओरी और शीतला था। वे अपने सिर में जुओं के कारण बहुत परेशान थीं। दोनों बहुओं को उन पर दया आई और उन्होंने उनके सिर को साफ करके उन्हें राहत दिलाई। इससे प्रसन्न होकर दोनों बहनों ने उन्हें पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया।
तब बहुओं ने रोते हुए अपने बच्चों के शव दिखाए और अपनी व्यथा सुनाई। यह सुनकर शीतला माता ने कहा कि उन्हें अपने कर्मों का फल मिला है, क्योंकि उन्होंने शीतला अष्टमी के दिन ताजा भोजन बनाकर परंपरा का उल्लंघन किया था। अपनी भूल का एहसास होने पर दोनों बहुओं ने माता से क्षमा मांगी और भविष्य में नियमों का पालन करने का वचन दिया।
माता शीतला उनकी भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न हो गईं और उन्होंने दोनों बच्चों को पुनः जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों बहुएं खुशी-खुशी अपने घर लौट आईं और हर वर्ष श्रद्धा और नियमपूर्वक माता शीतला का व्रत करने लगीं। तभी से इस पर्व को पूरे गांव में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाने लगा।
इस प्रकार शीतला अष्टमी केवल एक धार्मिक व्रत ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और परंपरा के महत्व को समझाने वाला एक पावन पर्व भी है। माता शीतला की कृपा से भक्त अपने जीवन में सुख, शांति और आरोग्य की कामना करते हैं।