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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > शील की डूंगरी शीतला माता मंदिर: आस्था, परंपरा और भक्ति का पवित्र धाम
मंदिर

शील की डूंगरी शीतला माता मंदिर: आस्था, परंपरा और भक्ति का पवित्र धाम

Ekta Mishra
Last updated: March 11, 2026 11:51 am
Ekta Mishra
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जयपुर की शील की डूंगरी स्थित शीतला माता मंदिर में शीतला अष्टमी पर दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु
जयपुर की शील की डूंगरी में स्थित शीतला माता मंदिर, जहां शीतला अष्टमी पर लगता है विशाल लक्खी मेला।
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शीतला अष्टमी के पावन अवसर पर Jaipur की चाकसू तहसील में स्थित शील की डूंगरी में श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। पहाड़ी पर स्थित शीतला माता के मंदिर में दर्शन के लिए दूर-दराज से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त 151 सीढ़ियां चढ़कर माता के दरबार तक पहुंचते हैं और सच्चे मन से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। तड़के सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं और पूरे क्षेत्र में भक्ति का वातावरण बना रहता है।

एक दिन पहले बने प्रसाद का लगता है भोग
शीतलाष्टमी के पर्व की एक खास परंपरा है, जिसे ‘बसौड़ा’ कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु माता को ठंडे पकवानों का भोग अर्पित करते हैं। मान्यता है कि अष्टमी से एक दिन पहले यानी सप्तमी को ही भोजन तैयार कर लिया जाता है और अगले दिन वही ठंडा प्रसाद माता को चढ़ाया जाता है। इस भोग में राबड़ी, पुआ, दही और अन्य ठंडे व्यंजन शामिल होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि माता को यह भोग अर्पित करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है और रोगों से रक्षा होती है।

शील की डूंगरी का ऐतिहासिक महत्व
राजस्थान के जयपुर जिले की चाकसू तहसील में स्थित शील की डूंगरी एक प्राचीन और पवित्र पहाड़ी मानी जाती है। यहां स्थित शीतला माता मंदिर का इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर परिसर में बनी बारहदरी पर लगे शिलालेख में इसके इतिहास का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि माधोसिंह के पुत्र गंगासिंह और गोपाल सिंह चेचक से पीड़ित हो गए थे। उस समय माता शीतला की कृपा से वे पूरी तरह स्वस्थ हो गए। इस चमत्कार के बाद राजा माधोसिंह ने शील की डूंगरी पर माता का भव्य मंदिर और बारहदरी का निर्माण करवाया।

रोगों से रक्षा करने वाली देवी
माता शीतला को विशेष रूप से चेचक और अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। प्राचीन समय में जब चेचक जैसी बीमारियां तेजी से फैलती थीं, तब लोग माता शीतला की पूजा करके रोगों से बचाव की कामना करते थे। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में माता को ‘सेढ़ माता’ के नाम से पूजा जाता है।

मंदिर में विराजमान माता शीतला की मूर्ति भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। श्रद्धालु यहां आकर अपने परिवार के स्वास्थ्य, सुख और शांति की कामना करते हैं। मंदिर का शांत वातावरण और पहाड़ी पर स्थित इसका दिव्य स्वरूप भक्तों को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है।

होली के आठ दिन बाद लगता है लक्खी मेला
हर वर्ष होली के आठ दिन बाद शीतला अष्टमी के अवसर पर यहां एक विशाल लक्खी मेला आयोजित होता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन करने और बसौड़ा का प्रसाद अर्पित करने आते हैं। इस पर्व के दौरान पूरे क्षेत्र में भक्ति, आस्था और उत्साह का विशेष वातावरण देखने को मिलता है।

सुरक्षा और व्यवस्थाएं रहती हैं चाक-चौबंद
शीतला अष्टमी के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए प्रशासन की ओर से मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा और व्यवस्थाएं सुदृढ़ की जाती हैं। श्रद्धालुओं को सुगमता से दर्शन हो सकें, इसके लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं। दिनभर मंदिर में पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला चलता रहता है और भक्त पूरे श्रद्धाभाव से माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

इस प्रकार शील की डूंगरी का शीतला माता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और भक्ति का जीवंत प्रतीक भी है, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन कर अपने जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करते हैं।

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