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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > जहां दिन में तीन बार रंग बदलती है मां लक्ष्मी की प्रतिमा
मंदिर

जहां दिन में तीन बार रंग बदलती है मां लक्ष्मी की प्रतिमा

Ekta Mishra
Last updated: March 6, 2026 12:40 pm
Ekta Mishra
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जबलपुर के अधारताल स्थित पचमठा मंदिर में स्थापित मां लक्ष्मी की चमत्कारी प्रतिमा
जबलपुर के पचमठा मंदिर में मां लक्ष्मी की प्रतिमा दिन में तीन बार रंग बदलती है, जिसे भक्त देवी का चमत्कार मानते हैं।
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मध्य प्रदेश के संस्कारधानी शहर जबलपुर में स्थित अधारताल क्षेत्र का मां लक्ष्मी मंदिर अपनी अद्भुत विशेषताओं और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर को लक्ष्मी नारायण पचमठा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां स्थापित मां लक्ष्मी की प्राचीन प्रतिमा न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने चमत्कारिक गुणों के कारण दूर-दूर से लोगों को आकर्षित करती है। माना जाता है कि इस मंदिर में विराजमान मां लक्ष्मी की प्रतिमा दिन में तीन बार अपना रंग बदलती है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग और विशेष बनाता है।

दिन में तीन बार बदलता है प्रतिमा का रंग
पचमठा मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता मां लक्ष्मी की प्रतिमा का रंग बदलना है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सुबह के समय प्रतिमा का रंग सफेद दिखाई देता है, जो शुद्धता और शांति का प्रतीक माना जाता है। दोपहर होते-होते यही प्रतिमा पीले रंग की प्रतीत होती है, जो समृद्धि और धन का संकेत मानी जाती है। वहीं शाम के समय प्रतिमा का रंग नीला नजर आता है, जिसे दिव्यता और रहस्य का प्रतीक माना जाता है। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए कई श्रद्धालु खास तौर पर मंदिर पहुंचते हैं और इसे मां लक्ष्मी की अलौकिक शक्ति का प्रतीक मानते हैं।

मंदिर का इतिहास और प्राचीनता
इस मंदिर का इतिहास भी उतना ही रोचक है जितनी इसकी मान्यताएं। बताया जाता है कि यह मंदिर गोंडवाना शासन काल में रानी दुर्गावती के समय बनाया गया था। उस दौर में रानी दुर्गावती के विशेष सेवापति और दीवान अधार सिंह ने अधारताल तालाब का निर्माण करवाया था और उसी क्षेत्र में मां लक्ष्मी का यह मंदिर स्थापित कराया गया। धीरे-धीरे यह स्थान आस्था और साधना का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

एक समय ऐसा भी था जब यह मंदिर देशभर के तांत्रिकों और साधकों के लिए विशेष साधना स्थल माना जाता था। अमावस्या की रात यहां विशेष पूजा-अर्चना और साधना की परंपरा भी रही है, जिसके कारण यह मंदिर आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

श्री यंत्र की अनूठी संरचना
इस मंदिर की एक और विशेषता इसके चारों ओर बनी श्री यंत्र की अनूठी संरचना है। कहा जाता है कि मंदिर परिसर में लगभग 1100 वर्ष पुरानी श्री यंत्र रचना मौजूद है। मंदिर के अंदर भी श्री यंत्र की विशेष आकृतियां दिखाई देती हैं, जो आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालु इस स्थान को अत्यंत शक्तिशाली और दिव्य मानते हैं।

सूर्य की पहली किरण और मां लक्ष्मी के चरण
मंदिर से जुड़ी एक और अद्भुत मान्यता यह है कि सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरण सीधे मां लक्ष्मी के चरणों पर पड़ती है। यह दृश्य देखने के लिए कई भक्त सुबह-सुबह मंदिर पहुंचते हैं। इसे देवी की कृपा और वास्तु की अद्भुत रचना का प्रतीक माना जाता है।

सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना होती है पूरी
इस मंदिर के बारे में यह भी मान्यता है कि यदि कोई श्रद्धालु लगातार सात शुक्रवार यहां आकर मां लक्ष्मी के दर्शन करता है, तो उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। मंदिर के कपाट सामान्य दिनों में रात को बंद होते हैं, लेकिन दीपावली के दिन मंदिर के द्वार पूरी रात खुले रहते हैं। इस अवसर पर मां लक्ष्मी का विशेष अभिषेक और पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें पंचगव्य से महाभिषेक भी शामिल होता है।

इसी कारण यह मंदिर केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि एक रहस्यमयी और आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र भी बन चुका है, जहां हर दिन श्रद्धालुओं की भीड़ मां लक्ष्मी के दर्शन के लिए उमड़ती है।

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