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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026: शुभ मुहूर्त, महत्व और संपूर्ण पूजन विधि
व्रत और त्योहार

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026: शुभ मुहूर्त, महत्व और संपूर्ण पूजन विधि

Ekta Mishra
Last updated: March 1, 2026 11:49 am
Ekta Mishra
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भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026 पर भगवान गणेश की पूजा करते श्रद्धालु, दीप और मोदक के साथ
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026 पर विधि-विधान से करें भगवान गणेश की पूजा
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हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणपति वंदना के बिना अधूरी मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर होता है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को “भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी” कहा जाता है। ‘भालचंद्र’ का अर्थ है जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित हो। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 6 मार्च 2026 को शाम 7 बजकर 53 मिनट से होगा और इसका समापन 7 मार्च 2026 को शाम 7 बजकर 17 मिनट पर होगा। शास्त्रों में बताया गया है कि यदि दो दिन चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी पड़े, तो पहले दिन व्रत रखा जाता है। इस वर्ष 6 मार्च 2026 को चंद्रोदय रात 9 बजकर 31 मिनट पर होगा। अतः भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत 6 मार्च को ही रखा जाएगा।

व्रत का आध्यात्मिक महत्व
संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से संकटों को दूर करने वाला माना गया है। ‘संकष्टी’ शब्द का अर्थ ही है संकटों का नाश करने वाला। भगवान गणेश बुद्धि, विवेक, सफलता और विघ्नों के विनाशक हैं। इस दिन उपवास और सच्चे मन से पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। आर्थिक परेशानियां, कार्य में बाधाएं, पारिवारिक क्लेश और मानसिक तनाव जैसे कष्ट दूर होते हैं।

  • पूजन विधि: कैसे करें गणपति की आराधना
    भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थल में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सुगंधित धूप अर्पित करें।
  • गणपति बप्पा को गंगाजल से स्नान कराएं और सिंदूर का तिलक लगाएं। उन्हें अक्षत, पीले पुष्प और उनकी प्रिय दूर्वा घास अर्पित करें। भगवान गणेश को मोदक या मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। साथ ही मौसमी फल भी चढ़ाए जा सकते हैं।
  • पूजन के दौरान एकाग्र मन से “ॐ भालचंद्राय नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। इसके बाद संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें। अंत में कपूर से आरती उतारें और गणपति से अपने जीवन के संकट दूर करने की प्रार्थना करें।
  • रात्रि में चंद्रमा के दर्शन के बाद जल में दूध और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। इसके पश्चात व्रत का पारण करें।
  • इस प्रकार श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत जीवन में शुभता, सफलता और शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
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