अयोध्या का राजभवन उस समय पूर्ण शांति और गरिमा से भरा हुआ था। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम सिंहासन पर विराजमान थे। उनके सम्मुख महान तपस्वी ऋषि अगस्त्य उपस्थित थे। युद्ध समाप्त हो चुका था, रावण का वध हो चुका था, परंतु श्रीराम के मन में एक गूढ़ जिज्ञासा शेष थी।
उन्होंने विनम्रता से पूछा –
“हे मुनिवर! रावण जैसे महाबली का अंत मेरे हाथों हुआ, पर क्या इसके पीछे कोई पूर्व जन्म का विधान भी था?”
ऋषि अगस्त्य मंद मुस्कान के साथ बोले—
“राघवेन्द्र! यह केवल इस जन्म की कथा नहीं है। रावण का विनाश बहुत पहले एक तपस्विनी के शाप से निश्चित हो चुका था। सुनो, यह गाथा देवी वेदवती की है।”
हिमालय की दिव्य तपस्विनी वेदवती
यह उस समय की बात है जब रावण अपने बल, अहंकार और वरदानों के मद में तीनों लोकों को रौंदता फिर रहा था। दिग्विजय यात्रा के दौरान वह हिमालय के दुर्गम वनों में पहुँचा।
वहीं उसने एक अलौकिक दृश्य देखा—एक तेजस्वी कन्या, जटा धारण किए, मृगचर्म पहने, कठोर तपस्या में लीन थी। उसका मुख सूर्य के समान तेजस्वी था और उसका सौंदर्य अप्सराओं को भी लज्जित कर रहा था।
काम और अहंकार से अंधा रावण उसके समीप गया और बोला—
“हे सुंदरी! तुम कौन हो और इस निर्जन वन में ऐसा कठोर तप क्यों कर रही हो?”
वेदवती का अटल संकल्प
कन्या ने नेत्र खोले और शांत, किंतु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया—
“राजन! मेरा नाम वेदवती है। मेरे पिता देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कुशध्वज थे। उनका संकल्प था कि वे मेरा विवाह केवल त्रिभुवन स्वामी भगवान विष्णु से ही करेंगे।”
वेदवती का स्वर भर आया।
“पर दैत्यराज शंभू को यह स्वीकार न हुआ। उसने छल से मेरे पिता की हत्या कर दी। मेरी माता भी यह दुःख सह न सकीं और चिता में सती हो गईं। अब मैं अकेली हूँ, पर मेरा संकल्प अडिग है। मैं भगवान नारायण को पति रूप में पाने हेतु तप कर रही हूँ।”
रावण का अहंकार और नारी का अपमान
वेदवती की बात सुनकर रावण ठहाका मारकर हँसा।
“विष्णु? वह तो वनवासी है! मैं लंकापति दशग्रीव हूँ। मुझे स्वीकार कर, मेरी रानी बन जा।”
वेदवती ने तीखे शब्दों में कहा
“पापी! नारायण के अतिरिक्त मेरा मन किसी के लिए नहीं। अपनी वाणी पर संयम रख।”
यह तिरस्कार रावण के अहंकार को असहनीय लगा। क्रोध और कामवासनावश उसने वेदवती के केश पकड़ लिए। उसी क्षण नारी शक्ति प्रचंड रूप में प्रकट हुई।
अग्नि प्रवेश और विनाश की प्रतिज्ञा
वेदवती ने अपने स्पर्श किए गए केश काट दिए। उसकी आँखों से अग्नि प्रकट हो उठी।
उसने गर्जना की
“दुष्ट! तूने नारी का अपमान किया है। अब मैं इस देह को त्यागती हूँ, पर सुन ले मैं पुनः जन्म लेकर तेरे विनाश का कारण बनूँगी। जिस नारी शक्ति को तूने तुच्छ समझा, वही तेरी मृत्यु का कारण बनेगी।”
इतना कहकर वेदवती ने योगबल से अग्नि प्रकट की और स्वयं को उसमें समर्पित कर दिया। रावण स्तब्ध रह गया।
पुनर्जन्म की यात्रा: कमल से समुद्र तक
ऋषि अगस्त्य ने आगे कहा—
“हे राम! वेदवती अपने वचन की पक्की थी। अगले जन्म में वह एक दिव्य कमल से प्रकट हुई।”
रावण ने उस शिशु को देखा और मोहित हो गया, पर उसके मंत्रियों ने गणना कर चेतावनी दी—
“महाराज! यह कन्या आपके कुल का विनाश है।”
भयभीत रावण ने उस बालिका को मंजूषा में बंद कर समुद्र में प्रवाहित कर दिया। लहरें उसे भारतवर्ष के तट तक ले आईं। भूदेवी ने उसे अपनी गोद में समाहित कर लिया।
मिथिला में सीता का प्राकट्य
समय बीतता गया। मिथिला में अकाल पड़ा। राजा जनक यज्ञ की तैयारी हेतु भूमि जोत रहे थे। तभी उनके हल की नोक एक मंजूषा से टकराई।
जब राजा ने उसे खोला, तो उसमें एक दिव्य कन्या प्रकट हुई वही वेदवती। हल की रेखा से प्राप्त होने के कारण उसका नाम पड़ा सीता।
वेदवती ही सीता: ऋषि अगस्त्य का उद्घाटन
ऋषि अगस्त्य बोले
“हे श्रीराम! जानकी ही वेदवती हैं। सतयुग में उन्होंने रावण के विनाश की प्रतिज्ञा की थी और त्रेतायुग में आपके साथ मिलकर उसे पूर्ण किया। आप विष्णु हैं और सीता लक्ष्मी स्वरूपा वेदवती।” यह सुनकर श्रीराम मौन हो गए। उन्होंने मन ही मन माता सीता के त्याग और नारी शक्ति को प्रणाम किया।
शिक्षा: नारी सम्मान ही धर्म की रक्षा है
यह गाथा केवल एक कथा नहीं, बल्कि सनातन धर्म का शाश्वत संदेश है।
नारी का अपमान ही रावण जैसे महाबली के विनाश का कारण बना।
जहाँ नारी का सम्मान नहीं, वहाँ शक्ति, वैभव और साम्राज्य भी टिक नहीं पाते।
चौसर खेलने और सांप की समाधि की रहस्यमयी मान्यताएं
मंदिर से जुड़ी मान्यताएं इसे और भी विशेष बनाती हैं। कहा जाता है कि रोज रात शयन आरती के बाद शिवलिंग के सामने चौसर बिछाई जाती है और सुबह वह बिखरी हुई मिलती है। मान्यता है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ रात्रि में चौसर खेलने आते हैं। इसके साथ ही, यहां स्थापित शिवलिंग किसी मनुष्य की नहीं, बल्कि सांप की समाधि पर स्थित है, जिसका नाम सिद्धू बताया जाता है। आज भी महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के मुख्य शिखर पर ध्वजा मल्लिवाल परिवार द्वारा ही चढ़ाई जाती है, जो परंपरा की निरंतरता का प्रतीक है।
आस्था और शिव भक्ति का जीवंत केंद्र
श्री सिद्धनाथ महादेव मंदिर महाशिवरात्रि पर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन आस्था, लोकविश्वास और शिव भक्ति का जीवंत उत्सव बन जाता है, जहां आकर श्रद्धालु आध्यात्मिक शांति और दिव्यता का अनुभव करते हैं।