जब जीवन में सांसारिक आश्रय एक-एक करके छूटने लगते हैं, तब मनुष्य का मन स्वभावतः सर्वेश्वर की शरण खोजने लगता है। कर्म करने के बाद भी जब मनचाहा फल प्राप्त नहीं होता, अथवा निरंतर प्रयासों के बावजूद सफलता हाथ नहीं लगती, तो नास्तिक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति भी आस्तिकता की ओर अग्रसर हो जाता है। ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र, अध्यात्म और ईश्वर-चिंतन मन को सांत्वना देने लगते हैं। यह अवस्था मानव जीवन की वह घड़ी होती है, जहां अहंकार टूटता है और आत्मचिंतन प्रारंभ होता है।
सुख और दुःख: जीवन के जुड़वां सत्य
शास्त्रों में सुख और दुःख को जुड़वां भाई कहा गया है, जो सदैव एक साथ रहते हैं। हमारे पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर परम पिता द्वारा निर्धारित विधान के अनुसार ये दोनों जीवन में अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। सुख का स्वरूप अत्यंत आकर्षक और मोहक होता है, जबकि दुःख का स्वरूप कठोर और भयावह प्रतीत होता है। इसी कारण मनुष्य सुख की ओर आकर्षित होता है और दुःख से दूर भागने का प्रयास करता है। किंतु यह भूल जाता है कि आत्मिक विकास में दोनों की समान भूमिका है।
मानव के छह आंतरिक शत्रु
मानव जीवन में सबसे बड़ा अवरोध बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे छह आंतरिक शत्रु हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और अहंकार। ये सभी प्रकृति जन्य हैं और प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहते हैं। सुख के वातावरण में ये शत्रु तीव्र गति से सक्रिय हो जाते हैं और व्यक्ति को भोग-विलास, आसक्ति और दुष्कर्मों की ओर धकेल देते हैं। परिणामस्वरूप मनुष्य कर्मबंधन में और अधिक उलझ जाता है, जिसका फल उसे इस जन्म में या आगामी जन्मों में भुगतना पड़ता है।
दुःख: आत्मशुद्धि और ईश्वर-स्मरण का माध्यम
इसके विपरीत, दुःख का वातावरण व्यक्ति को संयमित और अंतर्मुखी बनाता है। इस अवस्था में काम, क्रोध, लोभ जैसे शत्रु धीमी गति से सक्रिय रहते हैं, जिससे मन पर उनका प्रभाव कम हो जाता है। दुःख मनुष्य का ध्यान सांसारिक मोह से हटाकर परम पिता की ओर केंद्रित करता है। साथ ही, यह पूर्व जन्मों में किए गए अशुभ कर्मों के परिणामों से मुक्ति का अवसर भी प्रदान करता है। दुःख भोगने से पश्चाताप उत्पन्न होता है और भविष्य में सावधानीपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है। जब दुःख का चक्र पूर्ण होता है, तब सुख स्वयं जीवन में प्रवेश करता है।
ईश्वर के अवतार और दुःख की महिमा
मानव को मोह-माया और आंतरिक शत्रुओं से मुक्त करने के लिए परमात्मा ने अपने अवतारों में भी दुःख को स्वीकार किया। भगवान राम का वनवास हो या भगवान कृष्ण का संघर्षपूर्ण जीवन, दोनों ही उदाहरण यह सिखाते हैं कि दुःख आत्मबल और धर्म की परीक्षा है। पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान कृष्ण ने माता कुंती से वरदान मांगने को कहा, तो उन्होंने सुख के स्थान पर दुःख का वरदान मांगा। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा
“सुख के माथे सिला पड़े, जो नाम हृदय से जाए।
बलिहारी दुःख की, जो पल-पल नाम रटाए।”
यह वाणी स्पष्ट करती है कि दुःख ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को ईश्वर से जोड़ती है और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।