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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > यशोदा जयंती 2026: ममता, विश्वास और संतान सुख की जीवंत आस्था
मंदिर

यशोदा जयंती 2026: ममता, विश्वास और संतान सुख की जीवंत आस्था

Ekta Mishra
Last updated: February 7, 2026 3:29 pm
Ekta Mishra
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इंदौर यशोदा माता मंदिर में मां यशोदा की गोद में श्रीकृष्ण
यशोदा माता मंदिर, इंदौर – जहां मां की गोद में कृष्ण का स्वरूप दर्शनीय है।
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शनिवार, 7 फरवरी 2026 को मनाई जाने वाली यशोदा जयंती मातृत्व, त्याग और निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। मां यशोदा वह दिव्य शक्ति हैं, जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को जन्म न देकर भी अपनी ममता से उन्हें संपूर्ण संसार का आराध्य बना दिया। धार्मिक मान्यता है कि यशोदा जयंती के दिन व्रत, पूजा और श्रद्धा से मां यशोदा का स्मरण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है, घर में शांति आती है और पारिवारिक रिश्तों में मिठास बढ़ती है। विशेष रूप से वे महिलाएं, जो लंबे समय से संतान की कामना कर रही होती हैं, इस दिन मां यशोदा से अपनी मन्नत मांगती हैं। यही कारण है कि यह पर्व अन्य त्योहारों से अलग, भावनात्मक रूप से अत्यंत विशेष माना जाता है।

यशोदा जयंती से जुड़ी आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। भारत में एक ऐसा स्थान भी है, जहां मां यशोदा की ममता को आज भी जीवित और साकार माना जाता है। यह स्थान है मध्यप्रदेश का इंदौर, जहां मां यशोदा का देश का इकलौता मंदिर स्थित है। मान्यता है कि यहां निःसंतान दंपतियों की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होती है।

इंदौर का यशोदा माता मंदिर: अनोखी आस्था का केंद्र
इंदौर के खजूरी बाजार, राजवाड़ा के पास स्थित यशोदा माता मंदिर दुनिया में अपने आप में बिल्कुल अनोखा है। यह मंदिर लगभग 220 से 350 वर्ष पुराना बताया जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण, मां यशोदा की गोद में विराजमान हैं। यह दृश्य मातृत्व की उस भावना को दर्शाता है, जो शब्दों से परे है। मान्यता के अनुसार, यह देश का इकलौता मंदिर है जहां मां यशोदा की प्रतिमा आकार में बड़ी है और नंद बाबा की प्रतिमा अपेक्षाकृत छोटी है। मंदिर में श्रीकृष्ण के साथ राधा और रुक्मिणी जी की दुर्लभ संगमरमर की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं।

निःसंतान महिलाओं की सूनी गोद भरती हैं मां यशोदा
इस मंदिर की सबसे प्रसिद्ध मान्यता निःसंतान महिलाओं से जुड़ी हुई है। यहां महिलाएं मां यशोदा की गोद भरती हैं और संतान प्राप्ति की कामना करती हैं। विश्वास किया जाता है कि मां यशोदा भक्तों की सूनी गोद अवश्य भरती हैं। खास बात यह है कि यहां गोद भराई की रस्म संतान प्राप्ति से पहले की जाती है, जबकि सामान्यतः यह संस्कार गर्भधारण के बाद होता है। जब भक्तों की मन्नत पूरी हो जाती है, तो वे अपनी संतान के साथ पुनः मंदिर आकर धन्यवाद स्वरूप दोबारा गोद भराई करते हैं।

हर गुरुवार विशेष पूजा और जन्माष्टमी का उल्लास
मंदिर में हर गुरुवार को विशेष रूप से गोद भराई की रस्म होती है। महिलाएं चावल, नारियल, चुनरी और पारंपरिक पूजन सामग्री लेकर आती हैं और पुजारी विधि-विधान से पूजा संपन्न कराते हैं। मान्यता है कि मां यशोदा अपने पुत्र श्रीकृष्ण जैसे संस्कारवान संतान का आशीर्वाद देती हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। इंदौर के साथ-साथ भोपाल, उज्जैन, ग्वालियर और अन्य राज्यों से भी महिलाएं यहां दर्शन के लिए आती हैं। यह मंदिर आज भी मातृत्व, आस्था और विश्वास की उस शक्ति का प्रतीक है, जो हर युग में भक्तों को संबल देती रही है।

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