सनातन परंपरा में भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है, क्योंकि वे भाव के भूखे हैं। उन्हें भांग, धतूरा, बेलपत्र और दूध जितना प्रिय है, उतनी ही प्रिय भक्त की सच्ची श्रद्धा। बिहार के वैशाली जिले में स्थित बाबा बटेश्वर नाथ धाम इसी सत्य का जीवंत प्रमाण है। यहां महादेव को कोई विशेष मिठाई या महंगे पकवान नहीं, बल्कि साधारण सा बैंगन अर्पित किया जाता है। यही कारण है कि यह शिवालय देशभर में अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।
वैशाली जिले के जंदाहा प्रखंड में स्थित यह प्राचीन धाम केवल मंदिर नहीं, बल्कि लोक आस्था और विश्वास का केंद्र है। मान्यता है कि यहां बैंगन चढ़ाने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु बाजार से चुन-चुनकर सबसे अच्छा बैंगन लाते हैं और भोलेनाथ के चरणों में अर्पित करते हैं।
कैसे शुरू हुआ बैंगन चढ़ाने का रिवाज़
इस अनोखी परंपरा के पीछे एक मार्मिक कथा जुड़ी हुई है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, सदियों पहले इस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा था। चारों ओर त्राहि-त्राहि मची थी और लोगों के पास खाने तक का अभाव हो गया था। उस कठिन समय में महादेव की पूजा के लिए भी कुछ उपलब्ध नहीं था। केवल बैंगन की फसल ही ऐसी थी, जो किसी तरह उग पाई थी।
विवश होकर भक्तों ने वही बैंगन पूरी श्रद्धा के साथ बाबा को अर्पित कर दिया। कहा जाता है कि भक्तों की सादगी और विश्वास से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने क्षेत्र को पुनः खुशहाल बना दिया। तभी से बाबा बटेश्वर नाथ धाम में बैंगन चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है।
सावन और महाशिवरात्रि पर उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब
सावन मास और महाशिवरात्रि के अवसर पर इस धाम में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। मंदिर परिसर “हर हर महादेव” के जयकारों से गूंज उठता है। इन दिनों बाबा को अर्पित किए गए बैंगनों के ढेर लग जाते हैं। विशेष बात यह है कि यह भोग बाद में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है, जिसे श्रद्धालु बड़े श्रद्धाभाव से ग्रहण करते हैं। लोगों का विश्वास है कि इस बैंगन प्रसाद में महादेव की विशेष कृपा समाहित होती है।
स्वयं प्रकट शिवलिंग और पीढ़ियों से चली आ रही सेवा
मंदिर से जुड़े शशिकांत गिरी बताते हैं कि यह धाम केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सेवा और आस्था की परंपरा है। उनके अनुसार, उनके परिवार की आठवीं पीढ़ी यहां पूजा कार्य कर रही है। मान्यता है कि यहां का शिवलिंग वट वृक्ष के तने से स्वयं प्रकट हुआ है। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बंगाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर का निर्माण बंगाल के एक जजमान द्वारा कराया गया था।
‘भाव के भूखे हैं महादेव’
मंदिर विकास समिति के कोषाध्यक्ष सह पुजारी मुन्ना बाबा बताते हैं कि बाबा बटेश्वर नाथ केवल भाव के भूखे हैं। यहां आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। कहा जाता है कि राजा जनक भी यहां पूजा-अर्चना करने आते थे। आज भी यहां कच्चे बैंगन का भोग लगाया जाता है और उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। श्रद्धालुओं का अनुभव है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद यहां पूरी होती है।
सामाजिक समरसता का केंद्र बना बाबा बटेश्वर नाथ धाम
यह धाम सामाजिक समरसता की भी अनुपम मिसाल है। यहां जाति, वर्ग या ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं है। सभी भक्त समान भाव से महादेव के दर्शन करते हैं। मंदिर समिति और स्थानीय ग्रामीण मिलकर श्रद्धालुओं की सेवा में जुटे रहते हैं, जिससे हर आगंतुक को अपनापन महसूस होता है।
सच्ची श्रद्धा ही सबसे बड़ा प्रसाद
बाबा बटेश्वर नाथ धाम हमें यह संदेश देता है कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए दिखावा नहीं, बल्कि निर्मल मन और सच्ची श्रद्धा चाहिए। साधारण सा बैंगन यहां असाधारण आस्था का प्रतीक बन गया है। यदि आप भी महादेव के भक्त हैं और किसी अनोखे तीर्थ का अनुभव करना चाहते हैं, तो वैशाली के इस पावन धाम में अवश्य पधारें। यहां की परंपरा, विश्वास और भक्ति सचमुच इसे अन्य शिवालयों से अलग और विशेष बनाती है।