सनातन परंपरा और आध्यात्मिक चेतना को सशक्त करने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से एक ऐतिहासिक और विराट त्रिशूल सनातन हिंदू एकता यात्रा प्रारंभ हो चुकी है। इस यात्रा का केंद्र आकर्षण है 60 फुट लंबा विशाल त्रिशूल, जिसे देश के सबसे बड़े त्रिशूलों में से एक माना जा रहा है। यह यात्रा कई पवित्र नगरों से होकर गुजरते हुए 10 फरवरी को श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या जिले के चौरे बाजार में प्रवेश करेगी।
यह त्रिशूल यात्रा छिंदवाड़ा से प्रारंभ होकर सिवनी, लखनादौन, जबलपुर, कटनी, सतना, रीवा, प्रयागराज, प्रतापगढ़, अमेठी और सुल्तानपुर जैसे प्रमुख नगरों से होते हुए अयोध्या धाम पहुंचेगी। प्रत्येक नगर में त्रिशूल का भव्य नगर भ्रमण और शोभायात्रा निकाली जा रही है, जिससे सनातन संस्कृति के प्रति जनजागरण हो सके।
60 फुट का विशाल त्रिशूल: आस्था और साधना का प्रतीक
इस विशाल त्रिशूल का निर्माण छिंदवाड़ा जिले के एक छोटे से गांव झिरलिंगा में किया गया है। इसे स्थानीय शिल्पकार सुशील विश्वकर्मा ने लगभग एक वर्ष की मेहनत से तैयार किया। स्टील से निर्मित इस त्रिशूल की ऊंचाई 60 फीट, चौड़ाई 11 फीट और वजन लगभग 700 किलोग्राम है। वर्तमान में यह त्रिशूल छिंदवाड़ा के आदि शक्ति दुर्गा माता मंदिर में दर्शन हेतु स्थापित किया गया है।
यात्रा के आयोजकों के अनुसार, त्रिशूल को विशेष रूप से तैयार किए गए वाहन द्वारा अयोध्या तक ले जाया जा रहा है। यात्रा चौबीसों घंटे निरंतर चल रही है, जिसमें लगभग 50 श्रद्धालुओं का दल साथ चल रहा है।
अयोध्या में त्रिशूल की स्थापना और शिव मंदिर की विशेषता
यह विशाल त्रिशूल अयोध्या के विघ्नेश्वर धाम शिव मंदिर में स्थापित किया जाएगा। इसके साथ ही बीकापुर तहसील के रमपुरवा स्थित एक 500 वर्ष पुराने शिव मंदिर का भी विशेष उल्लेख किया जा रहा है, जहां इस क्षेत्र की अद्भुत परंपराएं देखने को मिलती हैं। इस मंदिर में प्रतिवर्ष पुजारी बदलते हैं और सूर्य देव की किरणों द्वारा शिवलिंग का प्राकृतिक अभिषेक होता है, जो इसे आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
सनातन हिंदू एकता यात्रा के प्रमुख संकल्प
यात्रा के आयोजकों और संरक्षकों ने इस यात्रा के माध्यम से कुछ प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संकल्प रखे हैं, जिनमें सनातन परंपराओं का संरक्षण, सामाजिक समरसता और हिंदू समाज की एकता को सुदृढ़ करना शामिल है। इनमें हर घर में धर्म, संस्कार, पूजा-पाठ, तुलसी, दीपक, रामचरितमानस पाठ और मंदिरों में सभी वर्गों की सहभागिता जैसे विचार प्रमुख हैं।
यह यात्रा केवल एक भौतिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति है। त्रिशूल, जो भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है, इस यात्रा के माध्यम से शक्ति, संरक्षण और धर्म की स्थापना का प्रतीक बनकर जनमानस को आध्यात्मिक रूप से जागृत कर रहा है।