राम नगरी अयोध्या को सनातन संस्कृति की रक्षा और गौरव से जुड़ी एक ऐतिहासिक सौगात मिली है। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्रीनिवास वरखेड़ी ने वाल्मीकि रामायणम (तत्त्वदीपिका सहित) की 233 वर्ष पुरानी दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपि प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा को सौंपकर इसे अयोध्या के राम कथा म्यूजियम को भेंट किया।
यह पांडुलिपि विक्रम संवत 1849 (1792 ई.) की है और संस्कृत भाषा में देवनागरी लिपि में लिखी गई है। इसमें आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के पाँच प्रमुख कांड बालकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड और युद्धकांड के साथ महेश्वर तीर्थ द्वारा रचित प्रसिद्ध टीका ‘तत्त्वदीपिका’ भी शामिल है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने इसे एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक हस्तांतरण बताया है, जो रामायण परंपरा के संरक्षण और वैश्विक अध्ययन के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
पांडुलिपि का महत्व और विशेषता
यह पांडुलिपि केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, नैतिक मूल्यों, धर्म और संस्कृति की जीवित धरोहर है। रामायण की यह दुर्लभ पाठ परंपरा पीढ़ियों तक ज्ञान, सत्य और मर्यादा का संदेश पहुँचाती रही है।
राष्ट्रपति भवन से अयोध्या तक
यह पांडुलिपि पहले राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में सुरक्षित रखी गई थी। अब इसे स्थायी रूप से अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय, अयोध्या को सौंप दिया गया है, जिससे शोधार्थी, श्रद्धालु और आम जनता इसे देख और अध्ययन कर सकेंगे।
अयोध्या को वैश्विक रामायण केंद्र बनाने की दिशा में कदम
अधिकारियों के अनुसार, यह पहल अयोध्या को रामायण विरासत का वैश्विक केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। कुलपति श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि यह उपहार वाल्मीकि रामायण के शाश्वत ज्ञान को अमर बनाता है और इसे अयोध्या में विद्वानों, भक्तों और आगंतुकों के लिए सुलभ करता है। वहीं नृपेंद्र मिश्रा ने इसे राम भक्तों और अयोध्या के राम मंदिर परिसर के लिए एक ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षण बताया।