लोहड़ी एक लोकप्रिय शीतकालीन पंजाबी लोक त्योहार है, जिसे मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व शीत ऋतु के अंत, फसल कटाई और वसंत ऋतु एवं नव वर्ष के आगमन का प्रतीक माना जाता है। लोहड़ी का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और इसे सिंधु घाटी सभ्यता जितना पुराना माना जाता है।
लोहड़ी का अर्थ और उत्पत्ति
लोहड़ी की उत्पत्ति को लेकर कई लोककथाएँ और मान्यताएँ प्रचलित हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, लोहड़ी को होलिका की बहन माना जाता है। कथा के अनुसार, होलिका दहन की अग्नि में लोहड़ी की मृत्यु हो गई, जबकि भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। कुछ परंपराओं में कहा जाता है कि लोहड़ी का नाम संत कबीर की पत्नी लोई के नाम पर पड़ा। वहीं एक अन्य मत के अनुसार, लोहड़ी शब्द ‘लोह’ से निकला है, जो सामूहिक भोज के लिए उपयोग किए जाने वाले मोटे लोहे के तवे को दर्शाता है।
दुल्ला भट्टी और लोहड़ी का संबंध
लोहड़ी का त्योहार पंजाब के वीर लोकनायक दुल्ला भट्टी से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। दुल्ला भट्टी एक राजपूत मुस्लिम थे, जिन्होंने अकबर के शासनकाल में मुगल अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह किया। वे गरीबों की मदद करते थे और जरूरतमंदों को धन एवं अनाज बांटते थे, इसी कारण उन्हें “पंजाब का रॉबिन हुड” कहा जाता है। दुल्ला भट्टी उन महिलाओं को बचाने के लिए भी प्रसिद्ध थे, जिन्हें जबरन गुलामी में बेचा जा रहा था। उन्होंने कई लड़कियों की रक्षा की और उनके विवाह कराए। सुंदर और मुंदरी, जिनका उल्लेख आज भी लोहड़ी के गीतों में होता है, उन्हीं में शामिल थीं। वर्ष 1599 में दुल्ला भट्टी को अन्यायपूर्वक पकड़कर फांसी दे दी गई, और लोहड़ी के दिन लोग उनके बलिदान को स्मरण करते हैं।
लोहड़ी की परंपराएँ और रस्में
लोहड़ी के दिन विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गाय के गोबर से लोहड़ी देवी की छोटी मूर्ति बनाई जाती है। सूर्यास्त के समय बड़े अलाव को जलाया जाता है और उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली, मिश्री आदि अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद लोग अलाव के चारों ओर परिक्रमा करते हुए गीत गाते और नृत्य करते हैं। आग के अंतिम अंगारों को घर लाना शुभ माना जाता है। इस दिन तिल और गुड़ का सेवन अनिवार्य समझा जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि ‘तिल’ और ‘रोढ़ी’ शब्द मिलकर पहले ‘तिलोढ़ी’ बने और बाद में इसका नाम लोहड़ी पड़ गया।
लोहड़ी और मकर संक्रांति
लोहड़ी का पर्व मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, बंगाल में मकर संक्रांति, तमिलनाडु में पोंगल, असम में माघ बिहू और केरल में ताई पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यह सभी पर्व सूर्य के उत्तरायण होने और नई फसल के स्वागत से जुड़े हैं।
लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, परंपरा, बलिदान और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, सामाजिक एकता और परंपराओं के संरक्षण का संदेश देता है।