सनातन धर्म में शनिवार का दिन न्याय के देवता भगवान शनिदेव की पूजा-अर्चना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि शनिदेव कर्मफल दाता हैं, यानी मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों के आधार पर वे जीवन में सुख और दुख प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि यदि व्यक्ति अच्छे कर्म करे, सत्य के मार्ग पर चले और किसी का बुरा न सोचे, तो शनिदेव की कृपा से वह शीघ्र ही धन, सफलता और उन्नति प्राप्त करता है। वहीं, बुरे कर्म या अधर्म की राह पर चलने वालों को शनिदेव दंड भी देते हैं।
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि शनिदेव की कुदृष्टि किसी व्यक्ति पर पड़ जाए, तो उसके जीवन में बाधाएँ, आर्थिक संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और मानसिक पीड़ा बढ़ सकती है। इसी कारण शनिदेव की आराधना, व्रत और स्तोत्र-पाठ का विशेष महत्व बताया गया है। प्राचीन ग्रंथों में राजा विक्रमादित्य और राजा दशरथ के शनि परीक्षा प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है, जिसमें शनिदेव ने उनकी कठिन परीक्षा ली और उनके धैर्य व भक्ति से प्रसन्न हुए।
शनिवार के दिन भक्त शनि मंदिर में दीपदान, तिल-तेल चढ़ाना, काला उढ़ना दान और पीपल वृक्ष की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन शनिदेव की आराधना करने से अनजाने पाप, गलतियों और जीवन में उपस्थित कष्टों से मुक्ति मिलती है। जो व्यक्ति करियर, व्यवसाय और धन लाभ में बाधाओं का सामना कर रहा हो, उसे इस दिन विशेष रूप से शनि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
शनिवार के दिन “दशरथकृत शनि स्तोत्र” का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। यह पवित्र स्तोत्र राजा दशरथ द्वारा शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए रचा गया था। धार्मिक मान्यता है कि इस स्तोत्र के प्रभाव से व्यक्ति के ऊपर शनि की कठिन दशा, साढ़ेसाती या ढैया का असर कम हो जाता है। साथ ही मानसिक परेशानियाँ, भय, कष्ट और कार्य में अड़चनें समाप्त हो जाती हैं।
इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की वाणी, कर्म और मन तीनों शुद्ध होते हैं। शनि कृपा से जीवन में स्थिरता, नौकरी में प्रगति, व्यापार में वृद्धि और आर्थिक सुधार देखा जा सकता है। दशरथकृत शनि स्तोत्र शनिवार की पूजा या सुबह-सुबह नहाकर बैठकर श्रद्धापूर्वक पढ़ने से अत्यधिक शुभ फल देता है।
दशरथकृत शनि स्तोत्र
दशरथ उवाच:
प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः॥
रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन्॥
सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी॥
याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं॥
एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम्॥
प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा॥
पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत॥
स्तोत्र प्रारंभ:
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:॥1॥
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते॥3॥
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च॥5॥
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते॥6॥
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:॥7॥
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥8॥
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:॥9॥
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:॥10॥
दशरथ उवाच:
प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम्।
अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित्॥