मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित हरसिद्धि माता मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। अपनी रहस्यमयी मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और अद्भुत परंपराओं के कारण यह मंदिर सदियों से भक्तों की श्रद्धा का केंद्र रहा है। लगभग दो हजार वर्ष पुराने माने जाने वाले इस शक्तिपीठ की महिमा इतनी व्यापक है कि यहां आने वाला हर भक्त देवी की दिव्य ऊर्जा को गहराई से महसूस करता है।
मंदिर का भव्य स्थापत्य, चारों दिशाओं में स्थित विशाल प्रवेश द्वार, प्राचीन बावड़ी और ऊंचे दीप-स्तंभ इसके आध्यात्मिक वैभव का प्रमाण हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है वहीं माता सती की कोहनी गिरी थी, और इसी कारण इसे शक्तिपीठ के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। यहां की देवी को शक्ति के परम रूप में पूजा जाता है और माना जाता है कि यहां की आराधना अत्यंत फलदायी होती है।
धार्मिक इतिहास में वर्णित चंड-मुंड वध की कहानी से जुड़ी ‘हरसिद्धि’ नाम की उत्पत्ति भी इस मंदिर की पौराणिक महिमा को और गहन करती है। चाहे वह देवी चंडी का दुष्टों का संहार हो या फिर राजा विक्रमादित्य की साधना से जुड़ी मान्यताएं हरसिद्धि मंदिर अपने भीतर अनगिनत कथाओं का दिव्य खजाना संजोए हुए है। यहां बलिप्रथा का निषेध है, क्योंकि देवी को वैष्णव स्वरूप में माना जाता है। मंदिर में श्रीसूक्त और वेद मंत्रों के माध्यम से ही विधिवत पूजा-अर्चना होती है।
चार दिशाओं में स्थित भव्य प्रवेश द्वार
हरसिद्धि माता मंदिर की वास्तुकला इसका एक प्रमुख आकर्षण है। मंदिर में चार दिशाओं में चार मुख्य द्वार बने हैं, जिनकी शिल्पकला अत्यंत सुंदर और पारंपरिक है। इन द्वारों की भव्यता मंदिर परिसर की आध्यात्मिक आभा को कई गुना बढ़ा देती है। दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित प्राचीन बावड़ी भी इस धाम का एक ऐतिहासिक प्रतीक है। इस बावड़ी के भीतर स्थापित पत्थर के स्तंभ पर उकेरा गया श्रीयंत्र अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र माना जाता है।
मंदिर के मुख्य प्रांगण में दो विशाल दीप-स्तंभ स्थित हैं, जो हरसिद्धि मंदिर की पहचान भी माने जाते हैं। नवरात्रि के दौरान इन दीप-स्तंभों पर हजारों दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं और पांच दिनों तक निरंतर जलने वाली दीप-मालाएं मंदिर परिसर को दिव्य उजास से भर देती हैं। भक्तों का विश्वास है कि इन दीप-स्तंभों पर दीप चढ़ाते समय बोली गई हर मनोकामना माता अवश्य पूरी करती हैं।
जहां गिरी थी माता सती की कोहनी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के देहान्त के बाद उनका शरीर उठाकर ब्रह्मांड में विचरने लगे, तब विष्णुजी ने उनके शरीर को अलग-अलग भागों में विभाजित किया था। जहां-जहां माता सती के अंग गिरे, वहीं शक्तिपीठ स्थापित हुए। उज्जैन के इस पवित्र स्थल पर माता सती की कोहनी गिरी थी। यह कारण है कि हरसिद्धि माता मंदिर को विशेष शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त है और यहां देवी के परम शक्तिरूप की आराधना होती है। क्षिप्रा नदी के तट और भैरव पर्वत की आध्यात्मिक ऊर्जा इस स्थल के महत्व को और गहरा करती है। माना जाता है कि यहां साधना करने वाला साधक शीघ्र ही देवी की कृपा प्राप्त करता है।
‘हरसिद्धि’ नाम की पौराणिक उत्पत्ति
चंड और मुंड नामक दो दैत्य कभी कैलाश पर्वत पर आक्रमण करने पहुंचे। उस समय महादेव और पार्वती द्यूत-क्रीड़ा में व्यस्त थे। दैत्य जबरदस्ती अंदर घुसना चाहते थे, तब नंदीगण ने उनका प्रतिरोध किया, लेकिन दैत्य उनसे लड़ते हुए भीतर तक पहुंचे। स्थिति गंभीर होने पर शिवजी ने देवी चंडी का आह्वान किया। देवी ने दोनों दैत्यों का वध कर दिया। उनके इस अद्भुत पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कहा कि दुष्टों का विनाश करने के कारण तुम ‘हरसिद्धि’ नाम से जानी जाओगी। तभी से यह नाम देवी के इस दिव्य रूप के लिए स्थापित हो गया।
राजा विक्रमादित्य की साधना से जुड़ी मान्यता
उज्जैन के महान सम्राट राजा विक्रमादित्य का इस मंदिर से विशेष संबंध माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, राजा विक्रमादित्य ने यहां गहन तपस्या की थी और हर 12 वर्ष में देवी को प्रसन्न करने के लिए अपना सिर अर्पित किया था। कहा जाता है कि ग्यारह बार देवी ने उनका सिर लौटाया, लेकिन बारहवीं बार ऐसा नहीं हुआ, जिसे उनके राज्यकाल के अंत का संकेत माना गया। मंदिर के पीछे स्थित स्थान पर आज भी कई प्रतीक रखे हुए हैं, जिन पर सिंदूर चढ़ाया जाता है और जिनका संबंध विक्रमादित्य की इसी कथा से जोड़ा जाता है।
हरसिद्धि माता मंदिर में पशु-बलि नहीं होती क्योंकि देवी को वैष्णव स्वरूप माना जाता है और वह परमार वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं। यहां श्रीसूक्त और वेद मंत्रों से विधिवत पूजा की जाती है। मंदिर के विशाल दीप-स्तंभ पर दीप चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि दीप-प्रज्ज्वलन के समय बोली गई हर मनोकामना देवी अवश्य पूरी करती हैं।