अयोध्या, जिसे सदियों से धर्म, मर्यादा और आध्यात्मिक संस्कृति की राजधानी माना जाता है, 25 नवंबर को एक ऐतिहासिक और दिव्य क्षण का साक्षी बनने जा रही है। यह ध्वजारोहण समारोह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि रघुकुल की उस विरासत का पुनर्स्मरण है जिसे हजारों वर्षों से सनातन परंपरा संरक्षित करती आई है। जिस मुहूर्त का चयन किया गया है—दोपहर 12 बजे से 12:30 बजे तक—वह सर्वोत्तम 30 मिनट का कालखंड माना गया है, जिसमें देवकार्य, स्थापत्य सिद्धि और ध्वजा स्थापना का अतुलनीय फल प्राप्त होता है। वैदिक गणना, शास्त्रीय मान्यताओं और ज्योतिषीय विश्लेषण से जुड़े इस दिव्य मुहूर्त में ऊर्जा, दिशा और आध्यात्मिक कंपन अपनी सर्वोच्च क्षमता पर होते हैं।
समारोह सुबह 11 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक आयोजित होगा, जिसका केंद्र बिंदु वही शुभ 30 मिनट है। इसी क्षण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत श्रीराम मंदिर के मुख्य शिखर पर स्थापित 161 फीट ऊंचे ध्वजस्तंभ पर धर्म ध्वज फहराएँगे। यह ध्वज केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि ऊर्जा, सत्य और धर्म की अविरल यात्रा का द्योतक है।
जैसे ही ध्वज आकाश में उठेगा, संपूर्ण परिसर वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद, ढोल-नगाड़ों और मंगलवाद्य की गूंज से भर उठेगा। गर्भगृह से लेकर परिक्रमा पथ तक घंटे-घड़ियाल एक साथ बजेंगे, जिसे परंपरा में “दैवीय आह्वान” कहा गया है। यह वह क्षण होगा जब स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही लोकों में शुभ कंपन प्रवाहित होते हैं।
धर्म ध्वज स्वयं भी आध्यात्मिक प्रतीकों का अद्भुत संगम है—22 फुट लंबा और 11 फुट चौड़ा, केसरिया रंग में सूर्यवंश की गरिमा, ‘ॐ’ की अनंत शक्ति और कोविदार वृक्ष की पवित्रता का समावेश। 360 डिग्री घूमने वाली आधुनिक तकनीक से निर्मित यह ध्वज निरंतर गति, स्वतंत्रता और उन्नति का द्योतक है।
पुरोहित कालकी राम बताते हैं कि ध्वज स्थापना सदैव विजय, पराक्रम, ऊर्जा और मंगल का प्रतीक रही है। यह समारोह अभिजीत मुहूर्त में सम्पन्न होगा—वह दुर्लभ, चिरशुभ और अत्यंत शक्तिशाली काल, जिसमें श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा भी आयोजित हुई थी। इसका प्रभाव केवल मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र, समाज और मानवता के सामूहिक कल्याण का वाहक माना जाता है।
अयोध्या का यह ध्वजारोहण समारोह आने वाली पीढ़ियों के लिए स्मरणीय अध्याय बनेगा—जहाँ वैदिक परंपरा, आधुनिक राष्ट्रभाव और दिव्यता एक ही क्षण में एकत्रित होंगे।