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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > मार्गशीर्ष मास का पहला सोम प्रदोष व्रत: शिव कृपा का दुर्लभ संयोग
व्रत और त्योहार

मार्गशीर्ष मास का पहला सोम प्रदोष व्रत: शिव कृपा का दुर्लभ संयोग

दिव्यसुधा
Last updated: November 16, 2025 12:39 pm
दिव्यसुधा
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सोम प्रदोष व्रत 2025 में शिव पूजा, शिवलिंग अभिषेक और प्रदोष काल का पावन दृश्य
17 नवंबर 2025: मार्गशीर्ष मास का पहला सोम प्रदोष व्रत—शिव आराधना का अत्यंत शुभ समय।
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हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का अत्यंत विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और जब यह सोमवार को पड़ता है, तो इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि सोमवार का दिन स्वयं महादेव को अत्यंत प्रिय है और प्रदोष तिथि शिवआराधना का सर्वश्रेष्ठ समय होता है। ऐसे में मार्गशीर्ष मास में पड़ने वाला यह सोम प्रदोष व्रत अत्यंत शुभ फल देने वाला माना गया है। इस दिन व्रत रखने, पूजा और मंत्र-जप करने से साधक को अद्भुत शांति, सफलता, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल वह समय है जब भगवान शिव अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने के लिए तांडव करते हैं और त्रिदेव अपनी संयुक्त कृपा बरसाते हैं।

Contents
सोम प्रदोष व्रत की तिथि और महत्वपूर्ण समयसोम प्रदोष व्रत की विधिमहत्वपूर्ण मंत्रसोम प्रदोष व्रत का महत्व

सोम प्रदोष व्रत की तिथि और महत्वपूर्ण समय

मार्गशीर्ष मास का पहला प्रदोष व्रत इस बार सोमवार को पड़ रहा है, जिससे इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

  • त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 17 नवंबर, सोमवार – सुबह 4:46 बजे
  • त्रयोदशी तिथि समाप्त: 18 नवंबर, मंगलवार – सुबह 7:11 बजे
  • सोम प्रदोष व्रत: 17 नवंबर 2025 (उदया तिथि के अनुसार)
  • प्रदोष काल: सूर्यास्त के बाद का समय — इसी काल में पूजा करनी चाहिए

शास्त्र के अनुसार, प्रदोष व्रत की पूजा सूर्यास्त के तुरंत बाद प्रारंभ करनी चाहिए, क्योंकि यही समय महादेव की आराधना का सर्वोत्तम मुहूर्त होता है।


सोम प्रदोष व्रत की विधि

1. सुबह का संकल्प

सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मन शांत रखकर व्रत का संकल्प लें कि आप पूरे दिन निराहार या फलाहार रहेंगे। शिव ध्यान करें और “ॐ नमः शिवाय” का जप करते रहें।

2. शाम की तैयारी

प्रदोष काल शुरू होने के थोड़ा पहले दोबारा स्नान करें। पूजा स्थान को साफ करें और उत्तर-पूर्व दिशा में पूजा की स्थापना करें।

3. स्थापना और अभिषेक

चौकी पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाकर भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी की प्रतिमा स्थापित करें। शिवलिंग पर पंचामृत – दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से अभिषेक करें। बेलपत्र, चंदन, भस्म, धतूरा और सफेद फूल अर्पित करें। माता पार्वती को श्रृंगार सामग्री अर्पित करें।

4. पाठ और मंत्र-जप

  • शिव चालीसा
  • प्रदोष व्रत कथा
  • महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जप
  • “ॐ नमः शिवाय” का कीर्तन

5. दीप—धूप और आरती

गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। अंत में शिव–पार्वती की आरती करें और क्षमा याचना करें।

6. व्रत पारण

अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करें। ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को दान अवश्य दें।


महत्वपूर्ण मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥”

यह मंत्र साधक को भय, रोग, बाधा और मृत्यु के कष्टों से रक्षा करता है और आयु-वृद्धि करता है।


सोम प्रदोष व्रत का महत्व

सोम प्रदोष व्रत मानसिक शांति, आरोग्य और सुख-समृद्धि देने वाला माना जाता है। सोमवार का दिन चंद्र देव का भी दिन है और चंद्रमा मन का कारक होता है। जिन लोगों की कुंडली में चंद्र दोष हो या मानसिक तनाव अधिक हो, उनके लिए यह व्रत विशेष कल्याणकारी होता है।

इस व्रत को करने से:

  • चंद्र दोष शांत होता है
  • रोग और बाधाएँ दूर होती हैं
  • संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है
  • मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं
  • आर्थिक स्थिति मजबूत होती है
  • ग्रहों का प्रकोप दूर होता है
  • शिव लोक की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग खुलता है

पौराणिक मान्यता है कि जो भक्त प्रदोष काल में सच्चे मन से शिव आराधना करता है, उसे भगवान शिव स्वयं आशीर्वाद देकर जीवन से कठिनाइयों को दूर करते हैं और भक्ति, संपत्ति तथा सुख–समृद्धि से परिपूर्ण करते हैं।

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