तेलंगाना के नालगोंडा जिले में हैदराबाद से लगभग 105 किलोमीटर दूर एक प्राचीन और अद्भुत मंदिर स्थित है, जिसे छाया सोमेश्वर महादेव मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर लगभग 800 वर्ष पुराना है और इसकी मौजूदा संरचना बारहवीं शताब्दी में चोल साम्राज्य के शासकों द्वारा बनाई गई थी। यह मंदिर अपनी विशेषताओं और रहस्यमयी छाया के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। स्थानीय लोग इसे “त्रिकुटलायम” के नाम से भी जानते हैं, लेकिन आमतौर पर इसे छाया सोमेश्वर महादेव मंदिर के नाम से ही पहचाना जाता है।
शिवलिंग पर रहस्यमयी छाया
मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण गर्भगृह में स्थित शिवलिंग पर पड़ने वाली रहस्यमयी छाया है। यह छाया पूरे दिन दिखाई देती है और अनगिनत श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। आश्चर्य की बात यह है कि गर्भगृह में शिवलिंग के सामने कोई स्तंभ नहीं होने के बावजूद यह छाया पड़ती है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह छाया मंदिर परिसर में लगे बाहरी स्तंभों की स्थिति और डिज़ाइन का कमाल है। सूर्य की गति के अनुसार इन स्तंभों की परछाइयां मिलकर शिवलिंग पर एक अद्भुत छाया उत्पन्न करती हैं। यह वास्तुकला और विज्ञान का अनूठा उदाहरण है, जो आज भी लोगों को चकित कर देता है।
प्राचीन विज्ञान और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण
भौतिक विज्ञानी मनोहर शेषागिरी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण करते समय पूर्व-पश्चिम दिशा, सूर्य की किरणों और प्रकाश के परावर्तन का गहन ज्ञान प्रयोग में लाया गया था। प्राचीन कारीगरों ने स्तंभों की स्थिति और डिज़ाइन इस तरह बनाई थी कि सूर्य की रोशनी के अनुसार इन स्तंभों की परछाइयां मिलकर शिवलिंग पर छाया डालती हैं। मंदिर की दीवारों में समय के साथ दरारें आ गई हैं, लेकिन तेलंगाना सरकार द्वारा किए गए संरक्षण कार्यों ने इसे सुरक्षित और संरक्षित रखा है। यह केवल आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि विज्ञान और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण भी है।
मंदिर का इतिहास और नाम का रहस्य
स्कंद पुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों में यह मंदिर उल्लेखित है। कहा जाता है कि चोल साम्राज्य के राजाओं ने इसे अपने संरक्षण में रखा, जिससे यह उत्तर भारत की तरह बड़े पैमाने पर आक्रमणों का शिकार नहीं हुआ। इसी कारण इसकी कलात्मकता और वैज्ञानिक चमत्कार आज भी मूल रूप से सुरक्षित हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग पर पड़ने वाली छाया और मंदिर के नाम का संबंध भी खास है। “छाया सोमेश्वर महादेव” नाम इसलिए पड़ा क्योंकि शिवलिंग पर पड़ने वाली रहस्यमयी छाया सदैव बनी रहती है। धार्मिक दृष्टि से इसे माता पार्वती की छाया माना जाता है, जो हमेशा भगवान शिव के साथ रहती हैं।
स्तंभों और मूर्तियों में कला का अद्भुत मेल
मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर रामायण और महाभारत के पात्रों की मूर्तियां उकेरी गई हैं, जो आज भी जीवंत प्रतीत होती हैं। इन मूर्तियों में न केवल कला की बारीकियाँ हैं, बल्कि वास्तुकला और विज्ञान का भी गहरा ज्ञान छुपा हुआ है। गर्भगृह में शिवलिंग पर पड़ने वाली छाया किसी एक स्तंभ से उत्पन्न नहीं होती, फिर भी यह अद्भुत दृश्य हमेशा मौजूद रहता है। यही कारण है कि यह मंदिर आस्था और विज्ञान का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है।
पर्यटन और आस्था का केंद्र
छाया सोमेश्वर महादेव मंदिर दूर-दूर से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। नालगोंडा के पनागल बस स्टैंड से यह मंदिर मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिससे यह आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि प्राचीन विज्ञान, वास्तुकला और इंजीनियरिंग का भी अद्भुत उदाहरण है। मंदिर की रहस्यमयी छाया और प्राचीन डिज़ाइन आज भी विज्ञान के लिए चुनौती बनी हुई है।