हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है, जिनकी पूजा हर शुभ कार्य से पहले की जाती है। हर महीने की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। इस दिन उनका व्रत और पूजन करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनुष्य के जीवन में सुख-शांति आती है। हालांकि, बहुत से लोग गणेश चतुर्थी, विनायक चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी को एक ही समझ लेते हैं, जबकि इन तीनों में स्पष्ट अंतर है।
संकष्टी चतुर्थी – संकटों से मुक्ति दिलाने वाली तिथि
संकष्टी चतुर्थी का अर्थ है “संकट से मुक्ति दिलाने वाली चतुर्थी”। यह तिथि हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आती है। इस दिन व्रत रखकर भगवान गणेश की पूजा की जाती है ताकि जीवन में आने वाले कष्टों, बाधाओं और परेशानियों से मुक्ति मिल सके।
शाम के समय चंद्र दर्शन के बाद गणेश जी की आरती और कथा का पाठ किया जाता है। इस व्रत को करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और व्यक्ति के जीवन से संकट दूर होते हैं। इसे “संकटहारा चतुर्थी” भी कहा जाता है।
विनायक चतुर्थी – बुद्धि और सिद्धि का प्रतीक
विनायक चतुर्थी हर माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को आती है। “विनायक” भगवान गणेश का एक नाम है, जो बुद्धि, विवेक और सिद्धि के देवता हैं। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त उन्हें दूर्वा, मोदक और लाल फूल अर्पित करते हैं। इस चतुर्थी पर व्रत रखने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कार्यों में सफलता मिलती है। इसे “वरदा विनायक चतुर्थी” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है — वरदान देने वाली चतुर्थी।
गणेश चतुर्थी – भगवान गणेश के जन्मोत्सव का पर्व
गणेश चतुर्थी सबसे प्रमुख पर्व है, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश के जन्म का उत्सव पूरे भारत में, विशेषकर महाराष्ट्र में, बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है। लोग घरों और पंडालों में गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं और दस दिनों तक विधि-विधान से पूजा करते हैं। अंतिम दिन “अनंत चतुर्दशी” पर गणपति विसर्जन किया जाता है। इस पर्व को गणेशोत्सव भी कहा जाता है।
तीनों चतुर्थियों का सार
इन तीनों चतुर्थियों का उद्देश्य एक ही है — भगवान गणेश की कृपा प्राप्त कर जीवन से विघ्नों का नाश और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करना। चाहे संकष्टी हो, विनायक या गणेश चतुर्थी — तीनों ही दिन भक्ति, श्रद्धा और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होते हैं।