लखनऊ। भारतीय संस्कृति सदैव अपने मूल्यों, परंपराओं और आदर्शों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ती आई है। इस सनातन संस्कृति की आत्मा वह स्मृति है जो हमें हमारे पूर्वजों, महापुरुषों और उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग की ओर बार-बार प्रेरित करती है। इसी भावना को सजीव करता है विश्वमांगल्य सभा, लखनऊ, जो आज के समय में सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जागरूकता का सशक्त माध्यम बन चुकी है।
पितृपक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय मन की वह गहराई है जहाँ श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का संगम होता है। इस अवसर पर विश्वमांगल्य सभा लखनऊ महानगर ने एक ऐसा आयोजन किया जिसने न केवल भारतीय परंपरा का पालन किया बल्कि हमारी सामाजिक चेतना को भी जाग्रत किया।
कार्यक्रम का उद्देश्य उन महान विभूतियों को स्मरण करना जिन्होंने न केवल अपने परिवारों को दिशा दी बल्कि सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र को अपने कर्म, सेवा और आदर्शों से प्रभावित किया। चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य सेवा हो, विधिक सहायता हो या व्यवसाय। इन महापुरुषों का योगदान बहुआयामी और चिरस्थायी रहा है। इस भावभीने आयोजन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल, स्वतंत्रता संग्राम के प्रखर सेनानी बाबू त्रिलोकी सिंह और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को हृदय से स्मरण करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इन विभूतियों ने अपने विचारों और कर्मों से एक ऐसा भारत गढ़ा जिसकी नींव लोकतंत्र, समानता, सत्य और अहिंसा जैसे मूल्यों पर टिकी है। आज जब हम उनके जीवन चरित्र का स्मरण करते हैं, तो यह केवल इतिहास को दोहराना नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य को प्रेरणा देना है। साथ ही खुर्शीदाबाद और जानकीपुरम की बहनों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही जिनके सहयोग से यह आयोजन सफल और प्रेरणादायी बना। इन सभी बहनों ने एक स्वर में यह संदेश दिया कि संस्कृति का संवर्धन केवल पुरानी परंपराओं का निर्वाह नहीं, बल्कि उनमें नवचेतना का संचार करना है।
विश्वमांगल्य सभा का यह आयोजन दिखाता है कि सांस्कृतिक गतिविधियाँ केवल आयोजन भर नहीं होती वे समाज के भीतर नई चेतना और मूल्यबोध पैदा करती हैं। जब हम अपने राष्ट्रीय, सामाजिक और साहित्यिक पूर्वजों को स्मरण करते हैं तब हम स्वयं से भी एक प्रश्न करते हैं क्या हम उनके दिखाए मार्ग पर चल रहे हैं? क्या हम उनके सपनों का भारत बना रहे हैं? इस छोटे से आयोजन ने एक विशाल संदेश दिया कि आज की पीढ़ी को महापुरुषों का नाम ही नहीं उनका चरित्र और विचार भी स्मरण रखना चाहिए तभी हम वास्तव में कृतज्ञ कहलाएंगे।
देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण वह है जिसे हम अपने पूर्वजों की स्मृति में श्रद्धा, सेवा और संस्कृति के संवर्धन के माध्यम से चुकाते हैं। विश्वमांगल्य सभा की बहनों ने इस ऋण को न केवल श्रद्धा से स्वीकारा बल्कि उसे कर्म से चुकाया भी। यह आयोजन दिखाता है कि हमारी सभ्यता केवल अतीत का गौरवगान नहीं वर्तमान की जिम्मेदारी भी है। जब हम पितृपक्ष में महापुरुषों को श्रद्धांजलि देते हैं तो हम आने वाली पीढ़ियों को भी एक दिशा देते हैं कि उनका जीवन केवल उपभोग नहीं उत्तरदायित्व और सेवा से पूर्ण होना चाहिए। इस आयोजन को विशेष बनाने में विश्वमांगल्य सभा की प्रियंका श्रीवास्तव, अवध प्रांत संयोजिका, सुरभि श्रीवास्तव, अखिल भारतीय धर्म एवं शिक्षा विभाग सह-संयोजिका, नमिता शुक्ला, नगर अध्यक्ष, आकांक्षा चित्रवंशी (सदाचार सभा, शेखूपुर), दीपिका श्रीवास्तव, आशा मिश्रा (विकास नगर सदाचार सभा) ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।