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दिव्य सुधा > featured > घर में पूजा-पाठ करते समय इन वास्तु नियमों को न करें नजरअंदाज, वरना हो सकता है नुकसान
featuredवास्तु शास्त्र/हस्त रेखा

घर में पूजा-पाठ करते समय इन वास्तु नियमों को न करें नजरअंदाज, वरना हो सकता है नुकसान

पूजा में श्रद्धा जरूरी है, पर दिशा और नियमों की परवाह भी उतनी ही ज़रूरी है।

दिव्यसुधा
Last updated: August 22, 2025 6:37 pm
दिव्यसुधा
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घर के पूजास्थल में पूर्व दिशा की ओर मुख कर दीपक जलाते श्रद्धालु
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Highlights
  • घर में मंदिर की दिशा उत्तर-पूर्व या पूर्व होनी चाहिए।
  • पूजा के समय बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख कर पूजा करें।
  • रोजाना घी या तेल का दीपक जलाएं – विशेषकर पीतल या मिट्टी का।

नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ का विशेष महत्व है। लगभग हर हिंदू घर में सुबह-शाम पूजा करने की परंपरा रही है। ऐसा माना जाता है कि रोजाना भगवान की पूजा करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। साथ ही, पूजा करने से देवी-देवताओं की कृपा भी बनी रहती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर पूजा-पाठ के दौरान वास्तु नियमों की अनदेखी की जाए, तो इसका उल्टा असर भी हो सकता है?

वास्तु शास्त्र, जो कि भारतीय परंपरागत स्थापत्य और ऊर्जा विज्ञान का आधार है, उसमें यह स्पष्ट बताया गया है कि पूजा करते समय कौन-सी दिशा में बैठना चाहिए, मंदिर कहां होना चाहिए, दीपक कैसे जलाना चाहिए आदि। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ जरूरी वास्तु नियमों के बारे में, जिनका पालन कर आप पूजा से अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

  1. मंदिर की सही दिशा – क्यों है ये महत्वपूर्ण?
    वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में मंदिर का स्थान अत्यंत पवित्र होता है। इसकी दिशा यदि सही नहीं होगी, तो पूजा का पूर्ण फल नहीं मिल पाता।

सही दिशा

  • उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) – सबसे शुभ दिशा मानी जाती है।
  • पूर्व दिशा – सूर्य की ऊर्जा का प्रवेश द्वार होने से यह भी उत्तम है।

बचने योग्य दिशा

  • दक्षिण दिशा – इस दिशा में मंदिर या भगवान की मूर्ति का मुख नहीं होना चाहिए।
  • शौचालय के पास या सीढ़ियों के नीचे – यहां मंदिर बनवाना वर्जित माना गया है।
  1. पूजा के समय बैठने की स्थिति और दिशा
    कई लोग खड़े होकर पूजा कर लेते हैं या चलते-फिरते आरती कर लेते हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार यह तरीका गलत है।

वास्तु अनुसार पूजा के नियम

  • शांत वातावरण में बैठकर पूजा करना चाहिए।
  • पूजा करते समय साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
  • अगर पूर्व संभव न हो तो उत्तर दिशा भी उपयुक्त मानी जाती है।

लाभ

  • मानसिक शांति मिलती है
  • ऊर्जा केंद्र सक्रिय होते हैं
  • ईश्वर से एक गहरा जुड़ाव बनता है
  1. दीपक से जुड़े वास्तु नियम

दीपक केवल प्रकाश का स्रोत नहीं है, यह सकारात्मक ऊर्जा और दिव्यता का प्रतीक है। पूजा के दौरान दीपक का विशेष महत्व होता है।

  • दीपक जलाने के नियम
  • रोजाना घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
  • पीतल या मिट्टी का दीपक श्रेष्ठ माना गया है।
  • अगर दीपक धातु से बना है, तो उसकी नियमित सफाई ज़रूरी है।
  • दीपक को मंदिर में दक्षिण-पूर्व दिशा में रखें, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहे।
  1. मंदिर के पास न करें ये गलतियां

मंदिर एक ऊर्जा केंद्र है, इसलिए इसके आसपास का वातावरण साफ-सुथरा और शांत होना चाहिए।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान:

  • मंदिर के पास जूते-चप्पल, कूड़ेदान न रखें।
  • मंदिर को बेडरूम के अंदर, शौचालय से सटे, या सीढ़ियों के नीचे न बनवाएं।
  • मंदिर में फूटे या खंडित मूर्तियां न रखें।

अच्छा विकल्प:

मंदिर के पास तुलसी का पौधा, धूपबत्ती, या बेलपत्र का पौधा रखें।

  1. पूजा से पहले स्नान और स्वच्छता

देवता स्वच्छता और पवित्रता के प्रतीक हैं, इसलिए साधक का भी शुद्ध रहना अनिवार्य है।

कैसे करें तैयारी:

  • रोजाना स्नान के बाद ही पूजा करें।
  • साफ-सुथरे कपड़े पहनें, विशेषकर सफेद या हल्के रंग।
  • महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान पूजा से दूर रहना चाहिए (यह मान्यता आधारित है)।
  1. मंदिर की नियमित सफाई

पूजा का स्थान शुद्ध और ऊर्जावान रहे, इसके लिए साफ-सफाई अत्यंत आवश्यक है।

करें ये कार्य:

  • रोजाना मंदिर की धूल झाड़ें।
  • पूजा के फूलों को सूखने से पहले हटा दें।
  • दीपक की कालिख, धूप की राख आदि समय पर साफ करें।
  1. मूर्ति या चित्र की ऊंचाई और स्थापना
    ध्यान देने योग्य बातें:
  • भगवान की मूर्ति बहुत बड़ी नहीं होनी चाहिए (4 इंच से 18 इंच तक उपयुक्त)।
  • मूर्ति को दीवार से सटा कर न रखें – कम से कम 1-2 इंच का फासला रखें।
  • मूर्ति की आंखों के सामने कुछ भी ढंका हुआ या अवरोध न हो।

वास्तु और विज्ञान – साथ-साथ

वास्तु शास्त्र केवल आस्था नहीं, एक ऊर्जा विज्ञान है। घर में जब मंदिर सही दिशा में होता है, दीपक सही ढंग से जलता है और पूजा में एकाग्रता रहती है, तो वह स्थान ऊर्जावान और शांतिपूर्ण बन जाता है।

इससे न केवल मानसिक स्वास्थ्य सुधरता है, बल्कि आपसी रिश्तों में भी सामंजस्य आता है।

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