लखनऊ के जानकीपुरम स्थित चमत्कारेश्वर शिव मंदिर में इस वर्ष जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। यह आयोजन विश्व मांगल्य सभा के धर्म संस्कृति शिक्षा विभाग, अवध प्रांत के तत्वावधान में हुआ, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं, विशेषकर महिलाओं और बच्चों ने भाग लिया।
यह भव्य आयोजन सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की शिक्षा, परंपरा और मूल्यों के पुनर्स्मरण का अवसर बना। कार्यक्रम की विशेष बात यह रही कि इसमें बच्चों ने भगवान श्रीकृष्ण और राधा का रूप धारण कर मोहक झांकियों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सभी का मन मोह लिया।
आयोजन की विशेषताएँ
कार्यक्रम का नेतृत्व धर्म संस्कृति शिक्षा विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका सुरभि श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में हुआ। उन्होंने न केवल आयोजन की व्यवस्था देखी, बल्कि उपस्थित जनसमूह को धर्म, संस्कृति और शिक्षा के महत्व पर भी संबोधित किया। उन्होंने कहा: “ऐसे पर्व केवल उत्सव नहीं हैं, ये हमारी सनातन परंपरा की पुनर्स्थापना और भावी पीढ़ी को इसकी शिक्षा देने के अवसर हैं।” कार्यक्रम में मंदिर समिति की ओर से राधा-कृष्ण की वेशभूषा में सजे बच्चों को स्मृति चिन्ह और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित भी किया गया।
धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा
सन 2014 से यह मंदिर धार्मिक आयोजनों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहाँ जन्माष्टमी, शिवरात्रि, रामनवमी, दीपावली जैसे पर्व परंपरागत विधि-विधान और समाज की सहभागिता के साथ मनाए जाते हैं। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ प्रत्येक आयोजन का उद्देश्य केवल पूजा नहीं, बल्कि संस्कृति का प्रचार, सामाजिक समरसता और शिक्षण भी होता है।
महिलाओं और बच्चों की भागीदारी
इस वर्ष के आयोजन में जानकीपुरम एवं आसपास के क्षेत्रों की महिलाओं ने भजन, कीर्तन और सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किए। बच्चों की प्रस्तुतियाँ विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं – जैसे:
- माखनचोर बाल गोपाल की झाँकी
- गोपिकाओं संग रासलीला
- बाल कृष्ण का कालिया नाग मर्दन
- राधा-कृष्ण की झूला झाँकी
- इन झाँकियों के माध्यम से बच्चों ने धार्मिक ग्रंथों की कथाओं को सजीव किया और दर्शकों को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
संस्कृति और शिक्षा का समन्वय
धर्म संस्कृति शिक्षा विभाग, अवध प्रांत, विगत कई वर्षों से न केवल धार्मिक आयोजनों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है, बल्कि समाज में सनातन धर्म की शिक्षा, संस्कृति के संरक्षण और युवाओं में नैतिक मूल्यों के प्रचार हेतु निरंतर प्रयासरत है। इनके कार्यक्रमों में धार्मिक ज्ञान, योग, ध्यान, और सामाजिक दायित्व जैसे विषयों को भी सम्मिलित किया जाता है। इस संगठन का उद्देश्य है कि धर्म केवल कर्मकांड न रह जाए, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उसका वास्तविक और नैतिक पक्ष स्थापित हो।
आयोजन का सामाजिक प्रभाव
इस आयोजन के माध्यम से एक ओर जहाँ लोगों में धार्मिक चेतना का संचार हुआ, वहीं दूसरी ओर एकजुटता, सहयोग और संगठन का भाव भी सुदृढ़ हुआ। महिलाएँ अपने पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर आईं, बच्चों को संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया और एक सशक्त सांस्कृतिक वातावरण की साक्षी बनीं।
भविष्य की योजनाएँ
सुरभि श्रीवास्तव जी ने घोषणा की कि आगामी समय में विभाग द्वारा:
- श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह
- बाल संस्कार शिविर
- योग और ध्यान सत्र
- महिला सशक्तिकरण के सांस्कृतिक प्रशिक्षण
- जैसे कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएगा ताकि समाज में सनातन मूल्यों की गहराई से स्थापना हो सके।
समापन समारोह और प्रसाद वितरण
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित श्रद्धालुओं को मंदिर समिति की ओर से महाप्रसाद वितरित किया गया। प्रसाद वितरण के दौरान मंदिर प्रांगण में “जय श्रीकृष्ण” के जयघोष गूंजते रहे।