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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > स्कन्द षष्ठी व्रत पूजा विधि, महत्व और कथा
व्रत और त्योहार

स्कन्द षष्ठी व्रत पूजा विधि, महत्व और कथा

दिव्यसुधा
Last updated: April 2, 2025 10:49 am
दिव्यसुधा
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स्कंद षष्ठी 
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By : Ekta Mishra

हिन्दू पंचांग अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कंद षष्ठी के रुप में मनाया जाता है. इस साल 03 अप्रैल 2025 को गुरुवार के दिन स्कन्द षष्ठी पर्व मनाया जाएगा। स्कन्द भगवान को अनेको नाम जैसे कार्तिकेय, मुरुगन व सुब्रमन्यम आदि नामो से जाना जाता है। दक्षिण भारत में इस पर्व को विशेष रुप से मनाने की परंपरा रही है.

स्कन्द देव शिव और पार्वती के पुत्र है. यह गणेश के भाई हैं. भगवान स्कन्द को देवताओं का सेनापति कहा जाता है. षष्ठी तिथि भगवान स्कन्द को समर्पित हैं. मान्यता है की स्कंद भगवान का जन्म इसी तिथि में हुआ था इसलिए इनके जन्म दिवस के रुप में भी इस तिथि को मनाया जाता है. धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु ग्रंथों के अनुसार सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य में अगर पंचमी तिथि समाप्त होती हो या षष्ठी तिथि का आरंभ हो रहा हो, इन दोनों तिथि के आपस में संयुक्त हो जाने के कारण इस दिन को स्कन्द षष्ठी व्रत के लिए चयन करना उपयुक्त माना गया है. षष्ठी तिथि का पंचमी तिथि के साथ मिल जाना स्कंद षष्ठी व्रत के लिए बहुत ही शुभ माना गया है. ऎसे समय में व्रत करने का नियम बताया गया है. इसी कारण से कई बार स्कन्द षष्ठी का व्रत पंचमी तिथि के दिन भी रखा जाता रहा है.

भगवान स्कंद का दक्षिण भारत से संबंध –
वैसे तो पुरे भारत में ही स्कंद भगवान का पूजन होता है लेकिन दक्षिण भारत से स्कंद भगवान का महत्व बहुत अधिक जुड़ा हुआ है. दक्षिण भारत में इन्हें अनेकों नामों से पूजा जाता है और इनके बहुत से मंदिर भी वहां मौजूद हैं. इसके संदर्भ में एक कथा बहुत अधिक प्रचलित है जो उनके दक्षिण के साथ के संबंध को दर्शाती है. जिसके अनुसार एक बार भगवान कार्तिकेय अपनी माता पार्वती और पिता शिव जी व भाई गणेश से नाराज होकर कैलाश पर्वत से मल्लिकार्जुन चले जाते हैं जो दक्षिण भारत की ओर हैं. ऎसे में दक्षिण उनका निवास स्थान बन गया . वास्तु में दक्षिण दिशा का संबंध भी स्कंद भगवान से ही जुड़ा रहा है.

कैसे करें पूजा-
स्कन्द षष्ठी के दिन कुमार कार्तिकेय की पूजा की जाती है. इस पूजा में इनके समस्त परिवार का पूजन भी होता है. विधि पूर्वक पूजा करने से कष्टों का निवारण होता है. कोई संघर्ष हो या शत्रुओं से विजय पानी हो, इस समय स्कंद भगवान का पूजन करने से व्यक्ति को अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है. भगवान स्कंद जो कुमार हैं, बाल रुप में हैं इसलिये इनका पूजन करना संतान के सुख में वृद्धि करने वाला होता है. बच्चों की रक्षा एवं उन्हें रोग से बचाव के लिए स्कंद षष्ठी की पूजा करना बहुत अनुकूल माना गया है.

  • स्कंद षष्ठी के दिन स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर स्कंद कुमार के नाम का स्मरण करना चाहिए.
  • पूजा स्थल पर कार्तिकेय की मूर्ति के साथ भगवान शिव, माता गौरी, भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये.
  • भगवान कार्तिकेय को अक्षत्, हल्दी, चंदन से तिलक लगाना चाहिए.
  • भगवान के समक्ष पानी का कलश स्थापित कर एक नारियल भी उस कलश पर रखना चाहिए.
  • पंचामृत, फल, मेवे, पुष्प इत्यादि भगवान को अर्पित करने चाहिए.
  • गाय के घी का दीपक जलाना चाहिए. भगवान को इत्र और फूल माला चढ़ाकर, स्कंद षष्ठी महात्म्य का पाठ करना चाहिए.
  • स्कंद भगवान आरती करके भोग लगाना चाहिए.
  • विधि प्रकार से भगवान स्कंद कुमार कार्तिकेय का पूजन करने से कष्ट दूर होते हैं और परिवार में सुख समृद्धि का वास होता है.

स्कंद षष्ठी कथा-
पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया कि उसे केवल शिव के पुत्र के द्वारा ही पराजित किया जा सकता है। ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया, लेकिन कुछ समय बाद माता सती ने आत्मदाह कर लिया, जिससे शिव का कोई पुत्र न हो सका। माता सती के जाने के बाद शिव जी ने संसार से दूरी बना ली और गहरे तप में लीन हो गए। इस बीच तारकासुर ने तीनों लोकों पर अत्याचार बढ़ा दिए। सभी देवता मदद के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने कहा कि तारकासुर का अंत केवल शिव-पुत्र के हाथों ही संभव है। देवताओं ने शिव को वैराग्य से बाहर लाने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने शिव पर प्रेम के बाण चलाए, जिससे शिव की तपस्या भंग हो गई। शिव इस छल पर अत्यंत क्रोधित हुए और अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में कामदेव की पत्नी रति ने शिव से कामदेव को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। शिव ने रति के अनुरोध को स्वीकार कर कामदेव को बिना शरीर के पुनर्जीवित कर दिया। इसके बाद शिव जी माता पार्वती से विवाह करने के लिए तैयार हुए। शिव दी ने अपनी तीसरी आंख से छह दिव्य चिंगारियां उत्पन्न कीं, जिन्हें अग्निदेव ने सरवन नदी में प्रवाहित कर दिया। इन चिंगारियों से छह बालकों का जन्म हुआ। माता पार्वती ने इन बालकों को अपनी ममता से एक कर दिया और इसी से भगवान कार्तिकेय प्रकट हुए। भगवान कार्तिकेय छह मुख और बारह भुजाओं वाले दिव्य योद्धा के रूप में विकसित हुए। उन्होंने युद्ध-कौशल में महारत हासिल की और तारकासुर के विरुद्ध युद्ध छेड़ा। इस भीषण युद्ध में उन्होंने तारकासुर का वध किया। तारकासुर के शरीर से एक मोर उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान कार्तिकेय ने अपना वाहन बना लिया। देवताओं ने कार्तिकेय को उनकी वीरता और पराक्रम के लिए देवसेना का सेनापति घोषित किया। शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को तारकासुर पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में स्कंद षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन भगवान कार्तिकेय के पराक्रम और विजय का प्रतीक है।


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