गणेश चतुर्थी का पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। घरों और पंडालों में भगवान गणेश की स्थापना की जा रही है। मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन ही भगवान गणेश का जन्म हुआ था। लेकिन इस पावन पर्व से एक दिन पहले जयपुर के प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसका भक्तों को पूरे साल इंतजार रहता है। यह परंपरा है सिंधारा या सिंजारा रस्म, जिसमें भगवान गणेश को मेहंदी अर्पित की जाती है और बाद में यही मेहंदी प्रसाद के रूप में भक्तों को दी जाती है। खास बात यह है कि इस प्रसाद को लेने के लिए बड़ी संख्या में अविवाहित युवक-युवतियां मंदिर पहुंचते हैं।
विवाह की मनोकामना से जुड़ी है आस्था
जयपुर की पुरानी परंपराओं में सिंधारा का विशेष स्थान माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जब किसी घर में विवाह या संतान का जन्म जैसे शुभ अवसर आते हैं, तब नए वस्त्र और मेहंदी चढ़ाने की परंपरा रही है। इसी परंपरा का संबंध मोती डूंगरी गणेश मंदिर की सिंधारा रस्म से भी जोड़ा जाता है। भक्तों की मान्यता है कि मंदिर में भगवान गणेश को अर्पित की गई मेहंदी को प्रसाद के रूप में प्राप्त करके हाथों पर लगाने से विवाह से जुड़ी बाधाएं दूर होती हैं। यही वजह है कि विवाह की इच्छा रखने वाले युवक-युवतियां इस दिन विशेष रूप से मंदिर पहुंचते हैं। हालांकि यह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास का विषय है, लेकिन भक्तों के लिए इस परंपरा का भाव भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा हुआ है।
3500 किलो मेहंदी से सजेगा आस्था का उत्सव
मंदिर के पुजारी के अनुसार, इस बार सिंधारा रस्म के लिए करीब 3500 किलो मेहंदी लाई गई है। भक्तों को प्रसाद बांटने के लिए मंदिर परिसर में कई स्थानों पर व्यवस्था की गई है, ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालुओं तक यह प्रसाद पहुंच सके। इस अवसर पर भगवान गणेश को विशेष पोशाक पहनाई जाती है। उन्हें स्वर्ण मुकुट और नौलखा हार से सजाया जाता है और चांदी के सिंहासन पर विराजमान किया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद भगवान को अर्पित मेहंदी भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित की जाती है। इस परंपरा में केवल जयपुर और राजस्थान के लोग ही शामिल नहीं होते। हरियाणा, गुजरात और पंजाब समेत दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
क्यों खास है मोती डूंगरी गणेश मंदिर?
मोती डूंगरी गणेश मंदिर जयपुर के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, यहां विराजमान भगवान गणेश की प्रतिमा राजस्थान के मावली क्षेत्र से जयपुर लाई गई थी। कहा जाता है कि प्रतिमा को बैलगाड़ी से जयपुर लाया जा रहा था। जिस स्थान पर बैलगाड़ी रुक गई, उसे भगवान गणेश की इच्छा माना गया और वहीं प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया गया। बाद में मोती डूंगरी की पहाड़ी के नीचे मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 18वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। समय के साथ यह स्थान जयपुर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
आस्था, विश्वास और बप्पा का आशीर्वाद
गणेश जी को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा करने की परंपरा है। भक्त मानते हैं कि सच्चे मन से भगवान गणेश की आराधना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और शुभ कार्यों का मार्ग प्रशस्त होता है। मोती डूंगरी की सिंधारा परंपरा भी इसी विश्वास को अपने भीतर समेटे हुए है। यहां पहुंचने वाले भक्त केवल मेहंदी लेने नहीं आते, बल्कि अपने मन की इच्छा और विश्वास भगवान के चरणों में रखते हैं। किसी के लिए यह विवाह की मनोकामना है, किसी के लिए सुख-शांति की प्रार्थना और किसी के लिए जीवन की परेशानियों से मुक्ति की उम्मीद। यही वजह है कि गणेश चतुर्थी से पहले मोती डूंगरी गणेश मंदिर में मनाया जाने वाला सिंधारा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा और विश्वास का सुंदर संगम बन चुका है। भगवान गणेश से यही प्रार्थना है कि हर भक्त के जीवन से विघ्न दूर हों और उसके घर में सुख, शांति, समृद्धि और मंगल का वास हो।