भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के प्रमुख आराध्यों में से एक हैं। देशभर में उनसे जुड़े अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनकी आस्था के साथ-साथ अपनी अनूठी पौराणिक और ऐतिहासिक पहचान भी है। जन्माष्टमी के इस विशेष अवसर पर आइए जानते हैं देश के कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में, जहां कृष्ण भक्ति की अलग-अलग परंपराएं आज भी जीवंत हैं।
अनंत वासुदेव मंदिर, भुवनेश्वर
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित अनंत वासुदेव मंदिर भगवान कृष्ण, बलराम और देवी सुभद्रा को समर्पित प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह मंदिर बिंदु सरोवर और प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर के निकट स्थित है। मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा वंश की रानी चंद्रिका देवी द्वारा करवाए जाने की मान्यता है। हालांकि, धार्मिक परंपरा के अनुसार इस स्थान पर इससे पहले भी भगवान विष्णु की प्रतिमा की पूजा की जाती थी। यहां का महाप्रसाद विशेष आकर्षण है, जिसे पारंपरिक रूप से मिट्टी के बर्तनों में चूल्हे पर तैयार किया जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर को फूलों और दीपों से सजाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

इस्कॉन मायापुर, पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल का मायापुर गौड़ीय वैष्णव परंपरा का प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। यह स्थान चैतन्य महाप्रभु की भक्ति परंपरा से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में मायापुर को अत्यंत पवित्र माना जाता है। यहां भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति हरे कृष्ण महामंत्र, संकीर्तन और सामूहिक भजन के माध्यम से की जाती है। मायापुर में स्थित इस्कॉन परिसर जन्माष्टमी के दौरान विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है। देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और भजन, कीर्तन, प्रवचन तथा भगवान कृष्ण के दर्शन में शामिल होते हैं।

नवद्वीप धाम, पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल का नवद्वीप धाम भी कृष्ण भक्ति की एक महत्वपूर्ण भूमि है। मान्यता के अनुसार, वर्ष 1486 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन यहीं चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में नवद्वीप को ‘गुप्त वृंदावन’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि चैतन्य महाप्रभु ने भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए संकीर्तन आंदोलन को व्यापक रूप दिया। नवद्वीप की गलियों में आज भी मृदंग और करताल के साथ होने वाला कीर्तन इस आध्यात्मिक परंपरा की जीवंत झलक देता है। यहां की धार्मिक यात्रा कृष्ण भक्ति के साथ चैतन्य महाप्रभु की प्रेम और भक्ति की शिक्षाओं से भी जुड़ती है।

द्वारकाधीश गोपाल मंदिर, उज्जैन
मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित द्वारकाधीश गोपाल मंदिर अपनी धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में मराठा शासक दौलतराव सिंधिया की पत्नी बायजाबाई शिंदे द्वारा करवाए जाने की जानकारी मिलती है। मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में इसका चांदी का दरवाजा शामिल है, जो श्रद्धालुओं का विशेष ध्यान आकर्षित करता है। इस मंदिर से हरिहर पर्व की परंपरा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि विशेष अवसर पर भगवान महाकाल की सवारी गोपाल मंदिर पहुंचती है। इसे भगवान शिव यानी ‘हर’ और भगवान कृष्ण यानी ‘हरि’ के मिलन के रूप में देखा जाता है। इस दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

जन्माष्टमी पर करें इन मंदिरों की आध्यात्मिक यात्रा
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े ये मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं हैं, बल्कि भारत की समृद्ध भक्ति परंपरा, इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर इन स्थलों का महत्व और भी बढ़ जाता है, जब मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और कृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन किया जाता है।