साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी, मंगलवार को पड़ रहा है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य ग्रहण को अत्यंत महत्वपूर्ण खगोलीय और आध्यात्मिक घटना माना गया है। यह ग्रहण फाल्गुन मास की अमावस्या तिथि पर दोपहर 3 बजकर 26 मिनट से शाम 7 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि ऊर्जा परिवर्तन का विशेष काल भी है, जिसका प्रभाव प्रकृति और मानव जीवन दोनों पर पड़ता है।
ज्योतिष मान्यता के अनुसार, ग्रहण के समय राहु और केतु सूर्य को ग्रसित करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है और सूर्य का प्रकाश आंशिक या पूर्ण रूप से ढक जाता है, तब सूर्य ग्रहण होता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह समय साधना, आत्मचिंतन और सावधानी का माना गया है।
सूर्य ग्रहण के दौरान क्या न करें?
गर्भवती महिलाएं रखें विशेष सावधानी
शास्त्रों में कहा गया है कि ग्रहण काल में गर्भवती महिलाओं को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। इस दौरान बाहर निकलने से बचें और ग्रहण की सीधी छाया में न आएं। सुई-धागा, कैंची या किसी भी नुकीली वस्तु का प्रयोग न करें। खाना-पीना भी यथासंभव टालना चाहिए। मान्यता है कि ग्रहण की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ सकता है, इसलिए इस समय अधिक सावधानी आवश्यक है।
भगवान की मूर्तियों को स्पर्श न करें
ग्रहण काल में पूजा-घर या मंदिर की मूर्तियों को स्पर्श करना वर्जित माना गया है। कई परंपराओं में इस समय मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं। मान्यता है कि ग्रहण के दौरान वातावरण में अशुद्धता बढ़ जाती है, इसलिए पूजा-पाठ बाहरी रूप से करने की बजाय मानसिक रूप से ईश्वर का ध्यान करना श्रेष्ठ माना गया है।
श्मशान या सुनसान स्थान पर न जाएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण काल में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को श्मशान या सुनसान स्थान पर अकेले जाने से बचना चाहिए। इस समय घर में रहकर प्रभु का स्मरण करना और सकारात्मक विचारों में मन लगाना उत्तम है।
सिलाई-कढ़ाई और नुकीली वस्तुओं से परहेज
ग्रहण के दौरान सिलाई, कढ़ाई या किसी भी प्रकार की कटाई-छंटाई से बचना चाहिए। नाखून और बाल काटना भी वर्जित माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस समय किए गए शुभ कार्य भी अपेक्षित फल नहीं देते, इसलिए ग्रहण काल में नए कार्यों की शुरुआत टालनी चाहिए।
किसी गरीब या असहाय का अपमान न करें
ग्रहण के समय क्रोध, विवाद और अपमानजनक व्यवहार से बचना चाहिए। विशेष रूप से किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति का अपमान करना अशुभ माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से शनिदेव की कुदृष्टि पड़ सकती है और जीवन में बाधाएं बढ़ सकती हैं।
सूर्य ग्रहण के दौरान क्या करें?
गर्भवती महिलाएं रखें नारियल
शास्त्रों में बताया गया है कि गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के समय अपने पास एक नारियल रखना चाहिए और घर के अंदर ही रहना चाहिए। ऐसा करने से ग्रहण की नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा मिलती है। मानसिक रूप से सकारात्मक रहना और ईश्वर का स्मरण करना भी लाभकारी है।
मंत्र जाप और ध्यान
ग्रहण काल साधना और ध्यान के लिए अत्यंत प्रभावी समय माना गया है। इस दौरान गायत्री मंत्र, आदित्य हृदय स्तोत्र या अपने इष्ट देव के मंत्रों का जाप करना शुभ फलदायक होता है। मानसिक पूजा का विशेष महत्व है। ध्यान और प्रार्थना से मन शुद्ध होता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
ग्रहण के बाद स्नान और शुद्धिकरण
ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान अवश्य करना चाहिए। इसके पश्चात पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करना शुभ माना गया है। मंदिर या पूजा स्थल को साफ करके भगवान की मूर्तियों को पुनः स्थापित करें और विधिवत पूजा-अर्चना करें। ग्रहण के बाद दान-पुण्य करना विशेष फलदायी होता है।
तुलसी से भोजन की शुद्धि
मान्यता है कि ग्रहण काल में भोजन दूषित हो सकता है। इसलिए ग्रहण शुरू होने से पहले पके हुए भोजन में तुलसी के पत्ते रख देना चाहिए। तुलसी को पवित्र और शुद्धि प्रदान करने वाली माना गया है। इससे भोजन की सात्विकता बनी रहती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण का महत्व
सूर्य आत्मा और ऊर्जा का प्रतीक है। जब सूर्य ग्रहण होता है, तो यह आत्ममंथन का संकेत भी देता है। यह समय बाहरी गतिविधियों की बजाय आंतरिक साधना के लिए उपयुक्त माना गया है। क्रोध, लोभ और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर यदि व्यक्ति इस समय का सदुपयोग करे, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
अंततः, सूर्य ग्रहण भय का नहीं, बल्कि सावधानी और साधना का समय है। यदि शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन किया जाए और सकारात्मक दृष्टिकोण रखा जाए, तो यह काल आध्यात्मिक उन्नति और आत्मशुद्धि का अवसर बन सकता है।