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दिव्य सुधा > अन्य > हनुमान जी ने श्री राम की सौगंध खाकर, उनसे से युद्ध क्यों किया
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हनुमान जी ने श्री राम की सौगंध खाकर, उनसे से युद्ध क्यों किया

दिव्यसुधा
Last updated: April 7, 2025 7:33 am
दिव्यसुधा
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shree ram hanuman
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ये तो आप सभी को पता है कि हनुमान भगवान श्रीराम के परम भक्त हैं और प्रभु के आज्ञा के बिना वह कुछ नहीं करते, परन्तु एक बार ऐसा भी हुआ था जब बजरंगबली श्रीराम जी से ही लड़ने पहुंच गए थे। हनुमान जी श्रीराम से लड़ने पहुंचे थे ये सुन कर हर कोई आश्चर्य में पड़ सकता है, लेकिन यह सत्य है। आपको यह सुनकर और भी आश्चर्य होगा हनुमान श्री राम से लड़ने गए तो उनसे लड़ने से पहले उनकी ही सौगंध भी खाई थी। तो चलिए जानते है कि बजरंग बली को क्यों श्री राम से युद्ध करना पड़ा।

पुराणों के अनुसार, एक बार सुमेरू पर्वत पर सभी संतों ने सभा की। कैवर्त देश के राजा सुकंत को जब यह पता चला तो वे सभी संतों का आशीर्वाद लेने जा रहे थे, तभी रास्‍ते में उन्‍हें देवर्षि नारद मिले। राजा सुकंत ने उन्‍हें प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद नारद जी ने उनसे उनकी यात्रा का कारण पूछा। तब राजा सुकंत ने उन्‍हें सभी संतों के सभा आयोजन की बात बताई। इस पर नारदमुनि ने कहा अच्‍छा है संतों की सभा में जरूर जाना चाहिए। ऐसा कहकर सुकंत को जाने का आदेश दे दिया।

राजा सुकंत जैसे ही जाने के लिए आगे बढ़े वैसे ही नारद जी ने उन्‍हें आवाज देकर कहा कि जिस सभा में आप जा रहे है वहां सभी को प्रणाम करिएगा, लेकिन ऋषि विश्‍वामित्र का अभिवादन बिल्‍कुल भी मत करिएगा। इस पर राजा सुकंत बहुत ही आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा कि क्या ऐसा करना सही होगा? तब श्री नारद जी ने कहा कि वह भी पहले राजा थे बाद में संत बनें और आप भी राजा हैं। राजा सुकंत ने नारद की बात मान ली और सभा में पहुंच कर उन्होंने वैसा ही किया।

सभा समाप्‍त होने के बाद विश्‍वामित्र श्री राम के पास पहुंचे और अपने साथ राजा सुकंत द्वारा किए गए अपमान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि ये संत परंपरा का अपमान है, लेकिन विश्‍वामित्र जी ने अपमान करने वाले का नाम नहीं लिया। तब श्री राम ने पूछा किसने किया आपका अपमान। विश्‍वामित्र जी ने कहा कि ये जानकर आप क्या करेंगे? श्रीराम जी ने कहा कि गुरु जी आपके चरणों की सौगंध लेकर प्रतिज्ञा करता हूं कि जिसका सिर आपके चरण में नहीं झुका उसका सिर मैं काट दूंगा।

भगवान श्रीराम की इस शपथ का जैसे ही राजा सुकंत को पता चला वह नारद मुनि को ढूढ़नें लगे, जब नारद मुनि उन्‍हें नहीं मिले तो वह व्‍याकुल होकर रो पड़े। तब नारद जी उनके सामने प्रकट हुए और तब सुकंत ने सारी व्यथा उनसे सुना दी। यह सुनते ही नारद जी ने उन्‍हें माता अंजनी के के पास जाने की सलाह दी और साथ यह भी कहा कि यदि माता ने आपको बचाने का वचन दे दिया तो तुम जरूर बच जाओगे, लेकिन यह भी कहा कि वह किसी को यह नहीं बताएंगे कि नारद जी ने उन्‍हें यह सलाह दी है।

राजा सुकंत बजरंगबली के घर के बाहर जा कर रोने लगे और रोने की आवाज सुनकर माता अंजनी बाहर आईं तो सुकंत ने कहा माता मुझे बचा लिजिए अन्‍यथा विश्‍वामित्र जी मुझे मार डालेंगे। इस पर माता अंजनी ने सुकंत को उसके प्राण बचाने का वचन दिया। उन्‍होंने कहा कि तुम मेरे शरण में हो तुम्‍हें कोई नहीं मार सकता। इसके बाद राजा सुकंत को विश्राम करने के लिए कहा। शाम ढले जब हनुमान जी माता अंजनी के पास आये तो उन्‍होंने पूरी बात बताई, लेकिन सुकंत को बुलाने से पहले पवनसुत से कहा कि तुम पहले सौगंध लो। तब हनुमान जी कहा कि वह श्रीराम के चरणों की सौगंध लेते हैं कि वह सुकंत के प्राणों की रक्षा करेंगे। तब माता अंजनी ने राजा को बुलाया। हनुमान जी ने पूछा आपको कौन मारना चाहता है? तब सुकंत ने बताया कि उन्हें भगवान श्रीराम मारने वाले हैं। इतना सुनते ही माता अंजनी हैरान रह गईं। उन्‍होंने कहा कि आपने तो विश्‍वामित्र जी का नाम लिया था। तब राजा ने कहा कि नहीं वह तो मरवाना चाहते हैं, लेकिन मारेगें तो भगवान श्रीराम ही।

हनुमान जी ने राजा सुकंत को उनकी राजधानी में छोड़ा और श्रीराम के दरबार में पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्‍होंने राम जी से पूछा कि वह कहां जा रहे हैं। तब राम ने बताया कि वह राजा सुकंत को मारने जा रहे हैं। तब हनुमान जी ने कहा प्रभू उसे मत मारिए। राम जी ने कहा कि वह तो अपने गुरु को वचन दे चुके हैं और अब पीछे नहीं हटेंगे। हनुमान जी ने कहा प्रभु मैंने सुकंत के प्राणों की रक्षा के लिए अपने इष्‍टदेव यानी कि आपकी सौगंध ली है। तब भगवान राम ने कहा कि तुम अपना वचन निभाओ और मैं अपना निभाउंगा।

हनुमान जी राजा सुकंत को लेकर पर्वत पर पहुंचे और राम नाम का कीर्तन करने लगे। उधर, राम जी राजा सुकंत को मारने के लिए उनकी राजधानी पहुंचे, लेकिन वह नहीं मिले तो वह उन्‍हें ढू़ढ़ते हुए पर्वत पर पहुंचे। वहां हनुमान जी राम मंत्र का जप कर रहे थे। राम जी को देखते ही सुकंत डर गये। तब हनुमान जी ने कहा कि राम मंत्र का जप करते रहो और निश्चिंत रहो। भगवन नाम पर पूरा भरोसा रखो लेकिन वह डरे हुए थे तो हनुमान जी ने सुकंत को राम नाम मंत्र के घेरे में बिठा दिया। इसके बाद राम नाम जपने लगे।

राम जी ने राजा सुकंत को देखकर जब बाण चलाया, तो वह राम नाम के मंत्र के आगे विफल हो जाते। राम जी हताश हो गए कि क्‍या करें? यह दृश्‍य देखकर श्री लक्ष्‍मण जी को लगा कि हनुमान जी भगवान राम को परेशान कर रहे हैं तो उन्‍होंने स्‍वयं ही हनुमान जी पर बाण चला दिया, लेकिन लक्ष्‍मण के बाण से हनुमान नहीं श्रीराम ही मूर्छित हो गए, क्यों कि हनुमान जी के ह्रदय में श्रीराम जी थे।

राम जी होश में आने के बाद हनुमान की ओर दौड़े। उन्‍होंने देखा कि उनकी छाती से रक्‍त बह रहा है। वह हनुमान जी का दर्द देख नहीं पा रहे थे। पवनसुत को होश आया तो उन्‍होंने देखा कि राम जी आंखें बंद करके हनुमान जी के छाती पर बार-बार हाथ रख रहे थे और इसी मौके पर पवनसुत ने सुकंत को अपनी गोद में बिठा लिया। तभी राम ने फिर से हनुमान जी के माथे पर हाथ फेरा, लेकिन इस बार वहां पवनसुत की जगह राजा सुकंत थे। राम जी मुस्‍कुराएं और हनुमान जी बोल उठे कि नाथ अब तो आपने इनके सिर पर हाथ रख दिया अब आप ही इसकी रक्षा करें।

तब श्रीराम ने हनुमान जी से कहा कि, हनुमत जिसे तुम अपनी गोद में बिठा लो उसके सिर पर तो मुझे हाथ रखना ही पड़ेगा, लेकिन गुरु जी को क्‍या जवाब देंगे। तभी हनुमान जी को विश्‍वामित्र जी सामने से आते दिखाई पड़े। उन्‍होंने राजा सुकंत से कहा कि जाओ तब प्रणाम नहीं किया तो क्‍या हुआ अब कर लो। राजा ने दौड़कर विश्‍वामित्र जी का अभिवादन किया। वह भी प्रसन्‍न हो गए और बोले राम इसे क्षमा कर दो।

राजा सुकंत विश्‍वामित्र जी से कुछ कहते कि इससे पहले नारद मुनि प्रकट हो गये। उन्‍होंने सारी घटना कह सुनाई। तब विश्‍वामित्र जी ने पूछा कि नारद तुमने ऐसी सलाह क्‍यों दी? तब नारद जी ने कहा कि अक्‍सर ही लोग मुझसे पूछते थे कि राम बड़े या राम का नाम बड़ा। तो मैनें सोचा कि क्‍यों न कोई लीला हो जाए कि लोग अपने आप ही समझ लें कि भगवान से अधिक भगवान के नाम की महिमा है।

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