प्राचीन समय की बात है, एक नगर में एक निर्धन ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ कठिन जीवन व्यतीत कर रही थी। उसका पति स्वर्गवास कर चुका था और वह अकेले ही घर और पुत्र की जिम्मेदारी संभालती थी। प्रतिदिन भिक्षा मांगकर ही दोनों का भोजन जुट पाता। बावजूद इसके, उसने अपने धार्मिक कर्तव्यों को कभी नहीं छोड़ा। ब्राह्मणी नियमित रूप से सोम प्रदोष व्रत करती थी। यह व्रत हर सोमवार को होता और इस दिन वह निर्जला व्रत रखती, यानी पूरे दिन पानी नहीं पीती। संध्या समय वह अपने घर के छोटे प्रांगण में भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करती, दीप जलाती और अर्घ्य अर्पित करती। उसका मानना था कि यह व्रत मनोकामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक शांति भी प्रदान करता है।
घायल बालक की सहायता
एक दिन भिक्षा मांगते समय उसने नगर के किनारे एक घायल बालक को देखा। बालक इतना दुर्बल और चोटिल था कि उसके जीवन पर खतरा नजर आता था। ब्राह्मणी ने तुरंत उसकी सहायता की। उसे अपने घर लाकर, अपने पुत्र के समान उसकी देखभाल की। धीरे-धीरे बालक ठीक हुआ और ब्राह्मणी ने उसे अपना स्नेह और प्रेम दिया।
शिक्षा और संस्कार

ब्राह्मणी ने बालक को संस्कार, शिक्षा और जीवन की मूलभूत बातें सिखाईं। उसे धर्म, नीति, और समाज सेवा की आदतें दीं। साथ ही, उसने बालक को सोम प्रदोष व्रत का महत्व भी समझाया। कहा कि यह व्रत केवल भगवान शिव की कृपा नहीं दिलाता, बल्कि संयम, धैर्य और आध्यात्मिक शक्ति भी प्रदान करता है। बालक ने व्रत का पालन गंभीरता से शुरू किया।
राजकुमार का रहस्य
कुछ वर्षों बाद पता चला कि यह बालक विदर्भ देश का राजकुमार था। उसके पिता की हत्या कर उसे राज्य से बाहर कर दिया गया था। यदि ब्राह्मणी उसे न पाती और पालती, तो शायद उसकी किस्मत कभी नहीं बदलती। ब्राह्मणी के स्नेह और शिक्षा के कारण वह तेजस्वी, बलशाली और न्यायप्रिय बन गया। समय के साथ राजकुमार ने अपना राज्य पुनः प्राप्त किया। उसने न्याय और धर्म की स्थापना की और हमेशा उस ब्राह्मणी को अपनी माता के समान माना। ब्राह्मणी का पुत्र भी धार्मिक साधना और सोम प्रदोष व्रत में निष्ठावान रहा। ब्राह्मणी और उसका परिवार धन, सुख और सम्मान से परिपूर्ण हो गया।
सोम प्रदोष व्रत का महत्व
इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा धर्म और परोपकार जीवन में शक्ति और आशीर्वाद देते हैं। सोम प्रदोष व्रत नियमित पालन से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत दुखों से मुक्ति, आत्मिक बल, परिवार और समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान भी प्रदान करता है। श्रद्धा और ईमानदारी से किया गया व्रत जीवन में संतुलन, समृद्धि और भक्ति लाता है।