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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > भगवान > संकटमोचन का पराक्रम: हनुमान द्वारा लंका दहन की अद्भुत कथा
भगवान

संकटमोचन का पराक्रम: हनुमान द्वारा लंका दहन की अद्भुत कथा

दिव्यसुधा
Last updated: February 21, 2026 6:19 pm
दिव्यसुधा
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हनुमान जी द्वारा जलती हुई पूँछ से स्वर्णमयी लंका को अग्नि में दहकाते हुए, आकाश में विशाल रूप में कूदते हुए दृश्य।
जलती हुई पूँछ के साथ लंका दहन करते हुए वीर हनुमान—अधर्म पर धर्म की उद्घोषणा।
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हनुमान द्वारा लंका दहन का प्रसंग रामायण का एक अत्यंत रोमांचकारी, वीरतापूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से गहन अर्थ रखने वाला अध्याय है। यह घटना केवल पराक्रम की कथा नहीं, बल्कि भक्ति, बुद्धि, धैर्य और धर्म की विजय का प्रतीक भी है। इस प्रसंग में हनुमान जी का साहस, उनकी चतुराई, उनकी अटूट श्रद्धा और भगवान श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति स्पष्ट रूप से प्रकट होती है।जब राक्षसराज रावण द्वारा माता सीता का हरण कर उन्हें लंका में बंदी बना लिया गया, तब भगवान श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए। सीता की खोज के लिए वानरराज सुग्रीव की सहायता ली गई और वानर सेना को चारों दिशाओं में भेजा गया। दक्षिण दिशा में खोज का दायित्व हनुमान जी को मिला। समुद्र के तट पर पहुँचकर जब सभी वानर असमंजस में थे कि सौ योजन विस्तृत समुद्र को कौन पार करेगा, तब जाम्बवान ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। अपने भीतर की अपार शक्ति को पहचानकर हनुमान जी ने विशाल रूप धारण किया और एक ही छलांग में समुद्र लांघने का संकल्प लिया।

लंका सोने की बनी हुई अत्यंत समृद्ध और भव्य नगरी

समुद्र पार करते समय भी उन्हें कई बाधाओं का सामना करना पड़ा। सुरसा ने उनकी परीक्षा ली, सिंहिका ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया, किंतु अपनी बुद्धि और बल के समन्वय से हनुमान जी ने सभी को परास्त किया। अंततः वे लंका नगरी के समीप पहुँचे। लंका सोने की बनी हुई अत्यंत समृद्ध और भव्य नगरी थी, जिसकी रक्षा के लिए लंकिनी नामक राक्षसी नियुक्त थी। हनुमान जी ने उसे परास्त कर लंका में प्रवेश किया। रात्रि के समय वे सूक्ष्म रूप धारण कर पूरी लंका में माता सीता की खोज करने लगे। अनेक महलों और उद्यानों को देखने के बाद अंततः उन्हें अशोक वाटिका में एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई माता सीता दिखाई दीं। वे अत्यंत दुःखी और कृश हो चुकी थीं, परंतु उनके मन में श्रीराम के प्रति अटूट विश्वास था। हनुमान जी ने पहले वृक्ष पर बैठकर श्रीराम की कथा सुनाई ताकि सीता को विश्वास हो सके। फिर उन्होंने नीचे आकर विनम्रता से श्रीराम की मुद्रिका उन्हें भेंट की। मुद्रिका देखते ही माता सीता की आँखों में आशा और आनंद के आँसू भर आए। उन्होंने हनुमान जी को आशीर्वाद दिया और श्रीराम को अपना संदेश देने के लिए कहा।

रावण और उसकी सेना की शक्ति का आकलन

अपना कार्य पूर्ण कर हनुमान जी लौट सकते थे, किंतु उन्होंने सोचा कि रावण और उसकी सेना की शक्ति का आकलन भी आवश्यक है। साथ ही, वे राक्षसों को यह भी बताना चाहते थे कि श्रीराम के दूत कितने पराक्रमी हैं। इस उद्देश्य से उन्होंने अशोक वाटिका में फल खाना प्रारंभ किया और वृक्षों को उखाड़ना शुरू कर दिया। राक्षसों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, परंतु हनुमान जी ने अनेक राक्षसों को परास्त कर दिया। जब यह समाचार रावण तक पहुँचा, तो उसने अपने बलशाली पुत्र अक्षय कुमार को भेजा, जिसे हनुमान जी ने युद्ध में मार गिराया। अंततः रावण ने अपने पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) को भेजा। मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। हनुमान जी जानते थे कि ब्रह्मास्त्र का सम्मान करना चाहिए, इसलिए उन्होंने स्वयं को उसके प्रभाव में बंधने दिया। वे चाहते तो उससे मुक्त हो सकते थे, परंतु उन्होंने सोचा कि रावण के दरबार में पहुँचकर उसे श्रीराम का संदेश देना अधिक उचित होगा। इस प्रकार वे बंधन में बँधकर रावण के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

पूँछ में कपड़े और तेल बाँधकर आग लगा दी

रावण के दरबार में हनुमान जी निर्भय खड़े रहे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में रावण को चेतावनी दी कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम को लौटा दे, अन्यथा उसका विनाश निश्चित है। रावण क्रोधित हो उठा और उसने हनुमान जी को मारने का विचार किया। तभी उसके भाई विभीषण ने समझाया कि दूत को मारना अधर्म है। तब रावण ने दंडस्वरूप हनुमान जी की पूँछ में आग लगाने का आदेश दिया, क्योंकि वानरों को अपनी पूँछ अत्यंत प्रिय होती है।

देखते ही देखते पूरी लंका अग्नि की लपटों में घिर गई

राक्षसों ने उनकी पूँछ में कपड़े और तेल बाँधकर आग लगा दी। परंतु हनुमान जी ने अपनी दिव्य शक्ति से अपनी पूँछ को लंबा कर लिया, जिससे अधिक से अधिक कपड़ा उसमें लपेटा जाने लगा। जब आग प्रज्वलित हुई, तब हनुमान जी ने अचानक अपना बंधन तोड़ दिया और सूक्ष्म रूप से निकलकर पुनः विशाल रूप धारण कर लिया। वे एक महल से दूसरे महल पर कूदने लगे। उनकी जलती हुई पूँछ से लंका के भवन, राजमहल, बाजार और सोने की अट्टालिकाएँ जलने लगीं। देखते ही देखते पूरी लंका अग्नि की लपटों में घिर गई। चारों ओर हाहाकार मच गया। यह दृश्य केवल भौतिक विनाश का नहीं, बल्कि अधर्म के अंत की शुरुआत का प्रतीक था। हनुमान जी ने सावधानी रखी कि अशोक वाटिका और वहाँ स्थित माता सीता को कोई हानि न पहुँचे। जब उन्हें लगा कि पूरा नगर जल चुका है, तब उन्हें क्षणभर के लिए चिंता हुई कि कहीं माता सीता को कोई हानि तो नहीं पहुँची। वे तुरंत अशोक वाटिका पहुँचे और उन्हें सुरक्षित देखकर निश्चिंत हुए। इसके बाद हनुमान जी समुद्र तट पर गए और अपनी जलती हुई पूँछ को समुद्र में डुबोकर अग्नि शांत की। फिर वे माता सीता के पास गए, उन्हें प्रणाम किया और आश्वासन दिया कि श्रीराम शीघ्र ही उन्हें मुक्त कराने आएँगे। माता सीता ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपनी चूड़ामणि श्रीराम को देने के लिए दी।

पूरी घटना का श्रीराम को विस्तार से वर्णन किया

हनुमान जी पुनः समुद्र लांघकर अपने साथियों के पास पहुँचे और वहाँ से सब मिलकर श्रीराम के पास गए। उन्होंने पूरी घटना का विस्तार से वर्णन किया—सीता माता की दशा, रावण की शक्ति, लंका का वैभव और अपने द्वारा किए गए लंका दहन का वृत्तांत। यह सुनकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और हनुमान जी को हृदय से लगा लिया। लंका दहन की यह कथा हमें अनेक शिक्षाएँ देती है। पहली शिक्षा है—आत्मविश्वास। जब तक हनुमान जी को अपनी शक्ति का स्मरण नहीं था, वे संकोच में थे; परंतु जैसे ही उन्हें अपनी सामर्थ्य का बोध हुआ, वे असंभव कार्य भी कर सके। दूसरी शिक्षा है—भक्ति और समर्पण। हनुमान जी ने जो कुछ किया, वह अपने स्वामी की सेवा के लिए किया। तीसरी शिक्षा है—बुद्धि और रणनीति। उन्होंने केवल बल का ही प्रयोग नहीं किया, बल्कि उचित समय पर उचित निर्णय भी लिया। अंततः लंका दहन अधर्म के विरुद्ध धर्म की उद्घोषणा थी। यह संदेश देता है कि जब कोई व्यक्ति सच्चे उद्देश्य, निस्वार्थ भावना और अटूट विश्वास के साथ कार्य करता है, तब वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है। हनुमान जी का यह अद्भुत पराक्रम आज भी हमें प्रेरणा देता है कि साहस, निष्ठा और भक्ति से जीवन की हर कठिनाई पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

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