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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > फाल्गुन माह के भौम प्रदोष व्रत कथा और महत्व
व्रत और त्योहार

फाल्गुन माह के भौम प्रदोष व्रत कथा और महत्व

दिव्यसुधा
Last updated: February 24, 2025 12:31 pm
दिव्यसुधा
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भौम प्रदोष व्रत कथा और महत्व
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हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। यह उपवास भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए रखा जाता है। इस व्रत को करने से महादेव की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही भक्तों की सभी मनोकामनाओं पूर्ण होती हैं। प्रदोष व्रत प्रत्येक माह में दो बार आता है और इस दिन भक्तजन प्रातः काल से लेकर संध्या तक उपवास रखते हैं और शिव की उपासना के बाद विधिवत पूजा कर व्रत का पारण किया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 25 फरवरी 2025 को मनाया जाएगा। बता दें कि सप्ताह के जिस दिन प्रदोष व्रत पड़ता है उसका नाम भी उसी के हिसाब से होता है। जैसे इस बार प्रदोष व्रत मंगलवार के दिन रखा जाएगा तो उसे भौम प्रदोष कहा जाएगा। भौम प्रदोष के दिन भोलेनाथ के साथ ही हनुमान जी की भी पूजा की जाती है। भौम प्रदोष का व्रत करने से जातक को कर्ज से मुक्ति मिलती है।

Contents
भौम प्रदोष व्रत का महत्व :-भौम प्रदोष व्रत कथा

भौम प्रदोष व्रत का महत्व :-

शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत करने से महादेव भक्तों की हर कामना को पूरा करते हैं. भौम प्रदोष व्रत का दिन कर्ज से मुक्ति पाने के लिए बहुत ही शुभ है. इस दिन मंगल से संबंधित चीजें गुड़, मसूर की दाल, लाल वस्त्र, तांबा आदि का दान करने से सौ गौ दान के समान फल मिलता है. बता दें कि त्रयोदशी तिथि की रात के पहले प्रहर में जो व्यक्ति किसी भेंट के साथ शिव प्रतिमा के दर्शन करता है उसपर भगवान शिव की कृपा सदैव बनी रहती है.

प्रदोष व्रत में करें इन नियमों का पालन : –
व्रत के दिन सुबह स्नान करके सूर्य देव को जल अर्पित करें और व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थल को साफ़ करके भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करें।
शिव परिवार की पूजा कर भगवान शिव को बेल पत्र, पुष्प, धूप-दीप आदि अर्पित करें।
व्रत कथा का पाठ करें और शिव आरती व शिव चालीसा का पाठ अवश्य करें।
प्रदोष व्रत के शुभ अवसर पर विधि पूर्वक पूजा-अर्चना करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

भौम प्रदोष व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में एक पुजारी हुआ करता था। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी अपने छोटे बेटे के साथ जीवन यापन के लिए भीख मांगने लगी। एक दिन जब वह भीख मांगकर लौटी, तो उसकी भेंट विदर्भ देश के राजकुमार से हुई, जो अपने पिता की मृत्यु के पश्चात वन में भटक रहा था। उसकी दयनीय स्थिति देखकर पुजारी की पत्नी ने उसे अपने साथ रहने की अनुमति दी और अपने पुत्र की तरह उसका पालन-पोषण करने लगी।

कुछ समय बाद पुजारी की पत्नी अपने दोनों पुत्रों के साथ शांडिल्य ऋषि के आश्रम गईं, जहां पर उन्होंने शिव जी के प्रदोष व्रत की कथा सुनी और व्रत का पालन करने लगीं। एक दिन उसके दोनों पुत्र वन में घूमने गए। पुजारी का बेटा घर लौट आया, परन्तु राजकुमार वन में ही रुक गया। वहीं उसकी भेंट गंधर्व कन्या अंशुमती से हुई। वह घर देर से लौटा, और अगले दिन पुनः उसी स्थान पर पहुंचा, जहां अंशुमती अपने माता-पिता के साथ रहती थी। कन्या के माता-पिता ने राजकुमार को देखकर उसे पहचान लिया और उनकी योग्यता को देखते हुए अपनी पुत्री का विवाह उससे करने का प्रस्ताव रखा। शिवजी की कृपा से राजकुमार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, और दोनों का विवाह संपन्न हुआ।

विवाह के बाद राजकुमार ने एक शक्तिशाली गंधर्व की सहायता से विदर्भ पर आक्रमण किया और विजयी होकर राज्य का शासक बन गया। राजा बनने के बाद उसने पुजारी की पत्नी और उसके पुत्र को अपने महल में बुलाया और उनका आदर-सत्कार किया। कुछ समय बाद अंशुमती ने राजकुमार से उसके जीवन की कहानी पूछी। तब राजकुमार ने अपने कठिन समय और प्रदोष व्रत की महिमा के बारे में बताया। यह मान्यता है कि प्रदोष व्रत करने से समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं और व्यक्ति को सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

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