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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > अश्विन मास के प्रदोष व्रत की तिथि को लेकर भ्रम, जानिए सही जानकारी, मुहूर्त और महत्व
व्रत और त्योहार

अश्विन मास के प्रदोष व्रत की तिथि को लेकर भ्रम, जानिए सही जानकारी, मुहूर्त और महत्व

दिव्यसुधा
Last updated: September 17, 2025 1:01 pm
दिव्यसुधा
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प्रदोष व्रत की तिथि को लेकर भ्रम
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सनातन धर्म में प्रदोष व्रत को अत्यंत शुभ और फलदायी व्रत माना गया है। यह व्रत हर महीने दो बार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है, और यह पूर्णतः भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन पूरे श्रद्धा और विधिपूर्वक व्रत व पूजन करता है, उसे शिव कृपा प्राप्त होती है, पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

अश्विन मास के प्रदोष व्रत को लेकर इस बार श्रद्धालुओं में भ्रम की स्थिति बनी रही है कि यह व्रत 18 सितंबर को रखा जाए या 19 सितंबर को? इसका मुख्य कारण त्रयोदशी तिथि का संधिकाल में आना है। पंचांगों के अनुसार, अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 18 सितंबर 2025 की रात 11:24 बजे शुरू होकर 19 सितंबर की रात 11:36 बजे तक रहेगी, इसलिए शास्त्रानुसार व्रत और पूजन का श्रेष्ठ समय 19 सितंबर को माना गया है।

प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त?

द्रिक पंचांग के अनुसार, 19 सितंबर को पूजा का शुभ मुहूर्त 06 बजकर 21 मिनट से लेकर 08 बजकर 43 मिनट तक रहेगा. यानी, पूजा का मुहूर्त 02 घंटे 21 मिनट तक रहने वाला है.

19 सितंबर 2025 को पड़ने वाला यह व्रत शुक्रवार को आ रहा है, जिससे इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाएगा। शुक्र प्रदोष व्रत विशेष रूप से सौंदर्य, वैवाहिक सुख, भौतिक समृद्धि और प्रेम-संबंधों में सुधार के लिए किया जाता है। जो भी भक्त इस दिन शिव-पार्वती की आराधना करता है, उसके जीवन में मानसिक संतुलन, पारिवारिक सुख और सांसारिक उन्नति के द्वार खुलते हैं।

पूजा विधि के अनुसार, भक्तों को इस दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। दिनभर फलाहार रहकर शिवजी का ध्यान करें। प्रदोष काल में शिवलिंग का जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करना चाहिए। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, भस्म और आक के पुष्प अर्पित करें। शिव चालीसा, रुद्राष्टक या प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें। इस दिन शिव-पार्वती की आरती करने के बाद दान देने की भी परंपरा है, जिससे पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है, बल्कि मानसिक और सांसारिक क्लेशों से मुक्ति पाने का साधन भी है। अश्विन मास के इस प्रदोष व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से भक्तों के सभी प्रकार के दोष समाप्त होते हैं और उनके जीवन में शुभता और ऊर्जा का संचार होता है।

इसलिए यदि आप भी भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो 19 सितंबर को पड़ने वाले इस प्रदोष व्रत को विधिपूर्वक करें, और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव का अनुभव स्वयं देखें।

TAGGED:pradosh vartvart tyoharसनातन धर्म
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